आज की कहानी- हिरोशिमा

(यह कहानी साहित्य दुनिया टीम के सदस्य/ सदस्यों द्वारा लिखी गयी है और इस कहानी के सर्वाधिकार साहित्य दुनिया के पास सुरक्षित हैं। बिना अनुमति के कहानी के किसी भी अंश, भाग या कहानी को अन्यत्र प्रकाशित करना अवांछनीय है. ऐसा करने पर साहित्य दुनिया दोषी के ख़िलाफ़ आवश्यक क़दम उठाने के लिए बाध्य है।)

आज की कहानी साहित्य दुनिया के लिए अरग़वान रब्बही ने लिखी है.
_________________________________

सुबह के आठ बजे के बाद का समय…
6, अगस्त 1945
हिरोशिमा शहर

रोज़ वो इसी वक़्त मिलते थे और कुछ देर सीढ़ियों पर बैठ कर बात करने लगते थे. कभी कोई बात ना रहे तो दुनिया की बात.. इसी तरह वो उस रोज़ भी बैठे थे, सामने की सड़क पर आती जाती साइकिलों को वो देखते, कोई बस रूकती तो ठहर कर उसकी ओर भी देखते लेकिन ख़ुद की बातें भी करते रहते…

“देखो, ना दुनिया जंग में मुब्तिला है और हम हैं कि रोज़ सुबह एक दूसरे से मिलने आते हैं कि कुछ प्यार की बातें हो जाएँ…,” सकूरा ने यूकी से कहा.
“हाँ, जंग भी तो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही.. ऐसे भी हम बस कुछ ही देर तो साथ बैठ पाते हैं… ” यूकी ने सकूरा के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा..
“कोई बता रहा था कि हम जंग नहीं जीत सकेंगे”
“हम जंग लड़ भी कहाँ रहे हैं, हम तो प्यार कर रहे हैं”
“तुम्हें तो प्यार सूझता है पर दुनिया में कितना कुछ हो रहा है उसकी फ़िक्र भी करना चाहिए…सुना है कि अमरीका हम पर किसी बड़े बम से हमला करने वाला है”
“अमरीका हम पर हमला नहीं कर सकेगा..ऐसे भी हमारा शहर तो युद्ध से दूर ही है..हमारे शहर पर तो कोई भी आक्रमण ना हुआ है बल्कि कहने वाले कहते हैं कि युद्ध से कारोबार में इज़ाफ़ा हुआ है.. सामान बिकने लगा है”
“तुम बहुत बेवक़ूफ़ हो.. जंग में लोग मारे जा रहे हैं और तुम हो कि व्यापार सूझ रहा है”
“अरे..मेरा ये मतलब नहीं था”
“अच्छा कोई बात नहीं, तुम अच्छे हो पर कभी-कभी कुछ भी बोल जाते हो”, कंधे को दोस्ताना तरह से पकड़ते हुए सकूरा ने कहा तो यूकी मुस्कुराया.
..
“हे.. यूकी.. वो देखो ऊपर कुछ है”
“फ़ाइटर प्लेन… इतनी ऊँचाई पर.. क्या ये अमरीकी है? हमारे फाइटर प्लेन इतनी ऊँचाई पर नहीं उड़ पाते…”
“तुम्हें कैसे पता.. हमारा ही है ये…”

8:16 AM
अचानक से बड़ा सा धमाका हुआ, शहर धुएँ में तब्दील हो गया, कहीं से तेज़ चीख़ें आ रहीं थीं तो कहीं से पुरज़ोर ख़ामोशी…

2:00 PM
उसी बिल्डिंग के अन्दर से एक छोटी सी लड़की निकली.. बाहर निकलते ही उसने देखा कि बेतहाशा बुरी शक्ल में लोग पड़े हैं, यूँ कि जैसे लकड़ियाँ हों.. बस में खड़े लोग किसी भूत की शक्ल से भी ख़राब शक्ल के हो गए थे…. और उन्हीं सीढ़ियों पर जहाँ सकूरा और यूकी बैठे थे, वहाँ काली सी परछाईं रह गयी थी, बिलकुल उसी अंदाज़ में वो परछाई थी जैसे वो बैठे थे.. सकूरा का हाथ यूकी के गले में था, .. जिस्म फ़ना हो चुका था, परछाई ज़मीन में सिमट गयी थी…

(हिरोशिमा और नागासाकी पर जब एटम बम से हमला हुआ तो कई लोगों के जिस्म पूरी तरह से ग़ायब हो गए थे और सिर्फ़ कार्बन कॉपी बची थी.. जिसे परछाई कहा है. फ़ीचर्ड इमेज का चित्र उसी दौर का एक चित्र है जिसमें सीढ़ियों पर परछाईं नज़र आ रही है)

About साहित्य दुनिया

View all posts by साहित्य दुनिया →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *