दो शा’इर दो रूबाई (11): जोश मलीहाबादी और नरेश कुमार शाद

जोश मलीहाबादी की रूबाई

ग़ुंचे तेरी ज़िंदगी पे दिल हिलता है,
सिर्फ़ एक तबस्सुम के लिए खिलता है
ग़ुंचे ने कहा कि इस चमन में बाबा
ये एक तबस्सुम भी किसे मिलता है

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नरेश कुमार शाद की रूबाई

चेहरे की तब-ओ-ताब में कौंद लपके,
आँखों में हसीन रात पलकें झपके,
एहसास की उँगलियाँ जो छू लें उनको
भीगे हुए अन्फ़ास से अमृत टपके

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रूबाई– रूबाई चार-चार मिसरों की ऐसी शा’इरी को कहते हैं जिनके पहले, दूसरे और चौथे मिसरों का एक ही रदीफ़, क़ाफ़िये में होना ज़रूरी है. इसमें एक बात समझनी ज़रूरी है कि ग़ज़ल के लिए प्रचलित 35-36 बह्र में से कोई भी रूबाई के लिए इस्तेमाल में नहीं लायी जाती है. रूबाइयों के लिए चौबीस छंद अलग से तय हैं, रूबाई इन चौबीस बह्रों में कही जाती है

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