दो शा’इर दो रूबाई (8): शाद अज़ीमाबादी और भारतेंदु हरिश्चंद्र

शाद अज़ीमाबादी की रूबाई

चालाक हैं सब के सब बढ़ते जाते हैं
अफ़्लाक-ए-तरक़्क़ी पे चढ़ते जाते हैं
मकतब बदला किताब बदली लेकिन
हम एक वही सबक़ पढ़ते जाते हैं
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भारतेंदु हरीश्चन्द्र की रूबाई

रहमत का तेरे उम्मीद-वार आया हूँ
मुँह ढाँपे कफ़न में शर्मसार आया हूँ
आने न दिया बार-ए-गुनह ने पैदल
ताबूत में काँधों पे सवार आया हूँ
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रूबाई– रूबाई चार-चार मिसरों की ऐसी शा’इरी को कहते हैं जिनके पहले, दूसरे और चौथे मिसरों का एक ही रदीफ़, क़ाफ़िये में होना ज़रूरी है. इसमें एक बात समझनी ज़रूरी है कि ग़ज़ल के लिए प्रचलित 35-36 बह्र में से कोई भी रूबाई के लिए इस्तेमाल में नहीं लायी जाती है. रूबाइयों के लिए चौबीस छंद अलग से तय हैं, रूबाई इन चौबीस बह्रों में कही जाती है

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