मजाज़ की ग़ज़ल: “जिगर और दिल को बचाना भी है”
Jigar aur dil ko bachana जिगर और दिल को बचाना भी है, नज़र आप ही से मिलाना भी है मुहब्बत का हर भेद पाना भी है मगर अपना दामन बचाना भी है जो दिल तेरे ग़म का निशाना भी है क़तील-ए-जफ़ा-ए-ज़माना भी है ये बिजली चमकती है क्यूँ दम-ब-दम चमन में कोई आशियाना भी है … Read more