तुम्हें ढूँढते हुए … (भाग ६) – फिर उसे याद कर रहा हूँ मैं
Screenshot
अब तक… | तुम्हें ढूँढते हुए…
सबा से अलग होने के बाद शकेब अपनी पुरानी ज़िंदगी छोड़कर हिमाचल के मंडी शहर पहुँच जाता है। किताबें और तन्हाई उसकी दुनिया बन जाती हैं। बरसों बाद सबा उसे ढूँढते हुए मंडी पहुँचती है, लेकिन शकेब उससे दोबारा दूर चला जाता है।
इसके बाद शकेब शिमला में अरविंद की किताबों की दुकान से जुड़ जाता है और अपनी मेहनत से उसे साहित्य प्रेमियों का एक ख़ास ठिकाना बना देता है। दूसरी ओर, सबा अपनी पुरानी यादों और आर्थिक मुश्किलों के बीच ज़िंदगी को सँभालने की कोशिश कर रही है।
दोनों की ज़िंदगियाँ अलग-अलग रास्तों पर आगे बढ़ रही हैं, लेकिन एक किताब और अधूरा रिश्ता आज भी उन्हें कहीं न कहीं जोड़े हुए हैं।
इसके आगे…
अरविंद की बनाई छोटी सी किताब की दुकान अब एक नामी लाइब्रेरी का रूप ले चुकी है। वो मानता था कि ये सब शकेब की वजह से हुआ है। लाइब्रेरी में किताबों की संख्या बढ़ती जा रही थी, अरविंद ने अपने लिए एक छोटा सा शीशे का केबिन बनवा लिया। कैश काउंटर पर एक लड़की पल्लवी बैठती थी। शकेब के लिए भी एक बड़ी कुर्सी और मेज़ की व्यवस्था की गई थी लेकिन वो अपनी उस जगह पर कम बल्कि किताबों के अलग अलग सेक्शंस में घूमता करता और वहीं फ़र्श पर बैठकर किताबें पढ़ा करता।
अरविंद ने शकेब को अपने केबिन में बुलाया। शकेब विल ड्यूरांट ‘द स्टोरी ऑफ़ फ़िलासफ़ी’ पढ़ रहा था, अरविंद की आवाज़ सुनकर उसने पढ़े जा रहे पन्ने को मोड़ा पन्ना और सामने की अलमारी में उसे अरस्तू और प्लेटो की किताबों के बग़ल में रख दिया।
शकेब केबिन में जाकर अरविंद के सामने की कुर्सी पर बैठ गया।
“एक काम है।”
“जी?”
“दिल्ली की एक बुक गैलरी ने विदेशी किताबों का ज़रूरत से ज़्यादा स्टॉक मँगा लिया था। अब वे कुछ किताबें हमें अच्छी क़ीमत पर दे रहे हैं।”
उन्होंने मेज़ पर रखी सूची उसकी तरफ़ बढ़ाई।
“तुम जाकर एक-एक किताब देख लेना। कहीं पन्ने फटे हों या प्रिंट में कोई ख़राबी हो तो वहीं छोड़ देना। उसके बाद माल ट्रांसपोर्ट में लोड करवा देना।”
शकेब ने सूची उठाई।
“ठीक है।”
अगली सुबह उसने दिल्ली की बस ले ली। गिरते पहाड़ों के दिलचस्प रास्तों से गुज़रता हुआ एक शहर, जैसे एक और दुनिया में जा रहा हो। शिमला और दिल्ली में पहाड़ और ज़मीन का नहीं, बल्कि ज़मीन और आसमान का फ़र्क़ है।
यूँ तो शिमला में भागमभाग नहीं है, सुकून है, लोग शिमला में रहने का ख़्वाब देखते हैं और दिल्ली में ऐसा कुछ नहीं जो बज़ाहिर अच्छा लगे लेकिन दिल्ली फिर भी दिल्ली है। शकेब के लिए तो दिल्ली सिर्फ़ दिल्ली भी नहीं, कुछ और भी है। बस के दिल्ली में दाख़िल होते हुए वो जितने रास्तों पर नज़र डालता उन सभी पर उसे सबा के साथ बीता कोई पल याद आता। कभी कभी तो वो सोचता कि इस सड़क पर वो और सबा कभी आए भी हैं या नहीं। बस कश्मीरी गेट पर रुक गई, सारे पैसेंजर उतर गए और शकेब भी अपने पुराने शहर पहुँच गया।
—-
बुक गैलरी शहर के एक बड़े मॉल में थी।
अंदर दाख़िल होते ही उसने सूची निकाली और किताबें मिलानी शुरू कर दीं।
रूसी साहित्य…
दर्शन…
इतिहास…
विदेशी उपन्यास…
वह हर किताब को खोलकर देखता, पन्ने पलटता और अलग रखता जाता। करीब एक घंटे बाद उसने आख़िरी कार्टन भी देख लिया। वापस लौटते हुए उसकी नज़र सामने की ओर उठी। कुछ दूर एक कपड़ों के शोरूम के बाहर रिसेप्शन डेस्क पर एक औरत बैठी थी।
उसने एक ग्राहक का स्वागत किया। फिर कंप्यूटर स्क्रीन पर झुककर कुछ टाइप करने लगी। शकेब ठिठक गया। वह सबा थी।
उसने अनायास एक क़दम आगे बढ़ाया…
फिर वहीं रुक गया।
सबा पहले से बहुत बदल चुकी थी। उसका चेहरा पहले से ज़्यादा दुबला लग रहा था। आँखों के नीचे हल्के गड्डे पड़ गए थे।
वह मुस्कुरा तो रही थी… लेकिन वह मुस्कान सिर्फ़ नौकरी का हिस्सा थी।
कुछ देर बाद एक कर्मचारी ने आकर उससे कुछ कहा। सबा तुरंत उठी, किसी ग्राहक को भीतर तक छोड़कर फिर अपनी कुर्सी पर लौट आई।
तभी शकेब की नज़र उसके नाम वाले बैज पर पड़ी।
उसने पहली बार महसूस किया…
वह यहाँ ख़रीदारी करने नहीं आती। यहीं काम करती है। उसके हाथ में पकड़ी किताबों की सूची धीरे-धीरे नीचे झुक गई।
उसे याद आया…
वही सबा, जो कभी बिना सोचे एक महँगा बैग ख़रीद लेती थी। आज पूरे दिन खड़े होकर लोगों का स्वागत कर रही थी। उसके भीतर जैसे कुछ टूट गया। उसने एक बार फिर सबा की तरफ़ देखा।
बस एक बार।
फिर बिना कोई आवाज़ किए मुड़ा…
और बुक गैलरी की तरफ़ वापस चल पड़ा।
सबा ने उस दिन सैकड़ों लोगों को आते-जाते देखा। लेकिन उन सबमें एक चेहरा ऐसा भी था…जिसे उसने देखा ही नहीं।
दिल्ली का काम ख़त्म करके शकेब शाम की बस से शिमला के लिए निकल पड़ा। बस शहर की भीड़ से निकलकर हाईवे पर आ गई। खिड़की के बाहर इमारतें पीछे छूटती जा रही थीं।
उसने बैग से आदतन Notes from Underground निकाली।
किताब खोली।
कुछ पल पहले पन्ने को देखता रहा। फिर बिना पढ़े उसे बंद कर दिया। किताब उसकी गोद में रखी रही। पूरे सफ़र में पहली बार ऐसा हुआ था कि उसने उसका एक भी पन्ना नहीं पढ़ा। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही मंज़र लौट आता।
रिसेप्शन डेस्क पर बैठी सबा…
थकी हुई…
कमज़ोर…
हर आने वाले को मुस्कुराकर “वेलकम” कहती हुई।
वह सोचता रहा-
क्या यह वही सबा है जिसे वह पीछे छोड़ आया था?
क्या इतने महीनों में उसकी ज़िंदगी भी उतनी ही बदल गई थी जितनी उसकी अपनी?
बस पहाड़ों की ओर बढ़ती रही।
रात गहराने लगी।
शकेब ने कई बार सोचा-
अभी उतर जाऊँ…
वापस दिल्ली लौट जाऊँ…
उससे बात करूँ…
पूछूँ कि वह कैसी है।
लेकिन हर बार यह ख़याल वहीं आकर रुक जाता।
वह उससे मिलने क्यों जाए?
उसने ख़ुद ही तो अपनी ज़िंदगी से दूर रहने का फ़ैसला किया था। उसने सिर सीट से टिका दिया।
खिड़की के बाहर अँधेरा था।
गोद में रखी Notes from Underground बंद थी।
और शायद पहली बार…
उसे महसूस हुआ कि कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब किसी किताब में नहीं मिलता।
__
सुबह की धूप अभी पूरी तरह कमरे में नहीं उतरी थी।
शकेब ने मेज़ पर रखी Notes from Underground उठाई।
किताब खुलते ही उसकी नज़र एक परिचित पंक्ति पर ठहर गई।
“You believe in a palace of crystal that can never be destroyed… And perhaps that is just why I am afraid of this edifice…”
उसने पूरा पन्ना नहीं पढ़ा।
बस इतना ही।
फिर किताब बंद कर दी।
आज शब्द उसके भीतर उतर नहीं रहे थे।
बार-बार उसे दिल्ली का वही मॉल याद आ रहा था।
रिसेप्शन डेस्क पर बैठी सबा…
उसकी थकी हुई आँखें…
और वह मुस्कान जो शायद अब सिर्फ़ नौकरी का हिस्सा रह गई थी।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि बेचैनी भी कभी-कभी इंसान को किसी शहर की तरफ़ धकेल देती है।
वह सीधे लाइब्रेरी पहुँचा।