तुम्हें ढूँढते हुए (भाग ४) – “फिर तुम्हारा निशाँ नहीं पाया”

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अब तक… तुम्हें ढूँढते हुए…

दिल्ली की ख़ामोशियों, मुंबई की भागती ज़िंदगी और हिमाचल के पहाड़ी शहर मंडी के बीच चलती यह कहानी है शकेब और सबा की—दो ऐसे लोगों की, जो कभी एक-दूसरे के बहुत क़रीब थे, लेकिन अब एक-दूसरे को तलाश कर रहे हैं।

शकेब अपनी पुरानी ज़िंदगी पीछे छोड़कर मंडी में एक गुमनाम-सी ज़िंदगी बिता रहा है। किताबें उसकी साथी हैं और ख़ामोशी उसकी आदत। सबा उसे ढूँढ़ते हुए मंडी पहुँचती है। बरसों बाद दोनों का सामना होता है, लेकिन शकेब उससे कुछ पल बात करके चला जाता है।

सबा को चाय वाले से पता चलता है कि शकेब अब बाज़ार की दुकानों पर सफ़ाई का काम करता है। अगले दिन वह उसके छोटे-से कमरे तक पहुँचती है, मगर वहाँ उसे शकेब नहीं मिलता। कमरे में करीने से रखी किताबों के बीच उसे एक ख़त भी नहीं दिखता, जो उसकी आँखों से छिपा रह जाता है।

उस ख़त में शकेब सबा को याद करता है, उसकी ख़ूबसूरती की तारीफ़ करता है, लेकिन साथ ही उसे अपनी तलाश छोड़ देने के लिए कहता है।

इसके बाद कहानी कुछ साल पीछे लौटती है-उस दिन, जब सबा ने शकेब से कहा था कि वह उसके साथ ख़ुश नहीं है और उससे प्यार नहीं करती। एक दरवाज़ा बंद हुआ था, और पीछे छूट गई थी एक ऐसी ख़ामोशी, जो शायद अब तक ख़त्म नहीं हुई है।

लेकिन अगर प्रेम समाप्त हो गया था, तो तलाश अब भी क्यों जारी है?

इसके आगे

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शकेब ने मंडी का अपना वही रूटीन यहाँ भी अपना लिया।

सुबह उठना…

काम पर जाना…

शाम को लौटकर किताबों में खो जाना।

फ़र्क़ बस इतना था कि यह शहर किताबों के मामले में मंडी से कहीं ज़्यादा मेहरबान था।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के आसपास किताबों की दुकानों में उसे वह सब मिलने लगा जिसकी तलाश वह मंडी में करता था। शिमला आने के बाद उसने उर्दू शाइरी ज़्यादा पढ़नी शुरू कर दी थी।

मिर्ज़ा ग़ालिब…

मीर तक़ी मीर…

नासिर काज़मी…

परवीन शाकिर…

अब्बास ताबिश…

वह एक-एक करके सबको पढ़ने लगा। कभी किसी शेर पर देर तक ठहर जाता। कभी किताब बंद करके खिड़की से बाहर देखने लगता। फिर दूसरी किताब उठा लेता।

लेकिन उन सबके बीच एक किताब ऐसी थी जो कभी अलमारी में ज़्यादा देर नहीं रहती थी।

फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की की Notes from Underground। वह उसे बार-बार पढ़ता।

आख़िरी पन्ना ख़त्म होते ही कुछ दिनों बाद फिर पहले पन्ने पर लौट आता। जैसे किसी पुराने ज़ख़्म पर बार-बार हाथ रखकर यह यक़ीन करना चाहता हो कि दर्द अब भी वहीं है।

कभी-कभी शाम को अकेले टहलते हुए उसके होंठ बेइख़्तियार बुदबुदाने लगते-

“I am a sick man… I am a spiteful man. I am an unattractive man. I believe my liver is diseased.”

राह चलते लोग उस पर एक सरसरी नज़र डालकर आगे बढ़ जाते।

उन्हें क्या मालूम…

वह किसी किताब की पहली पंक्तियाँ नहीं दोहरा रहा था। वह धीरे-धीरे उन्हें अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाता जा रहा था।

—-

दिल्ली।

कनॉट प्लेस के एक सैलून में सबा पेडीक्योर करा रही थी। उसके एक हाथ में मोबाइल था। इंस्टाग्राम की रील्स लगातार ऊपर सरकती जा रही थीं।

एक…

दूसरी…

तीसरी…

लेकिन उसकी नज़र किसी भी वीडियो पर नहीं ठहर रही थी। उँगलियाँ बस आदतन स्क्रीन पर चल रही थीं। ध्यान कहीं और था।

कुछ देर बाद उसने मोबाइल कुर्सी के बाज़ू में, अपनी कमर के पास रख दिया। उसकी नज़र सामने लगे बड़े आईने पर टिक गई।

और उसी आईने में उसे कई साल पुराना एक मंज़र दिखाई देने लगा।

शकेब…

वह हमेशा उसके साथ सैलून तक आता था। बग़ल वाली कुर्सी पर बैठ जाता।

कभी कोई किताब पढ़ता… कभी उससे यूँ ही बातें करता रहता।

वह हँसकर पूछती —

“तुम बोर नहीं हो रहे?”

और वह मुस्कुराकर कहता—

“तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ… बोर कैसे हो सकता हूँ?”

सबा के होंठों पर अनायास एक फीकी-सी मुस्कान आ गई।

उसी पल किसी ने धीरे से पुकारा—

“मैडम…”

वह नहीं सुन पाई।

“मैडम…”

इस बार आवाज़ थोड़ी ऊँची थी। वो अपने ख़्वाबनुमा पुरानी ज़िन्दगी के मंज़र से बाहर आयी।

“जी…?”

सैलून की लड़की मुस्कुरा रही थी।

“हो गया, मैडम।”

सबा ने एक पल इधर-उधर देखा। उसे ऐसा लगा जैसे बगल वाली कुर्सी अभी भी किसी के इंतज़ार में ख़ाली पड़ी हो।

——

कुछ महीने बीत गए।

शिमला अब शकेब के लिए नया शहर नहीं रहा था। एक दिन वह हमेशा की तरह विश्वविद्यालय के पास वाली किताबों की दुकान में किताबें देख रहा था। दुकान के मालिक, पचपन साल के अरविंद, कई दिनों से उसे देख रहे थे।

वह अक्सर घंटों किताबों के बीच खड़ा रहता। कभी किसी किताब का पहला अध्याय पढ़ता। कभी पीछे लिखी भूमिका। कभी किसी अनजान लेखक की किताब ख़रीद लेता।

एक दिन अरविंद ने मुस्कुराकर पूछा—

“इतनी किताबें पढ़ लेते हो?”

शकेब ने कहा,”मुझे पढ़ना पसंद है।”

उस दिन दोनों की बातचीत पहली बार दस मिनट से ज़्यादा चली। फिर यह रोज़ का सिलसिला बन गया।  कभी वे दोस्तोयेव्स्की पर बात करते। कभी ग़ालिब पर। कभी अरस्तू और इमैनुएल काँट पर।

एक शाम बातचीत के दौरान अरविंद को मालूम हुआ कि शकेब पास में कपड़ों की दुकान में काम करता है। अरविंद अपनी बुक शॉप को अकेले ही संभालता था,

“अगर तुम्हें मंज़ूर हो… तो यहाँ काम कर लो।”

शकेब ने बिना ज़्यादा सोचे हामी भर दी।

धीरे-धीरे दुकान बदलने लगी। सबसे पहले उसने किताबों को विषय के हिसाब से अलग-अलग हिस्सों में रखा।

दर्शन…

उपन्यास…

इतिहास…

शायरी…

जीवनी…

फिर उसने हर किताब की धूल साफ़ करनी शुरू की। कई किताबों के भीतर छोटे-छोटे काग़ज़ रखे, जिन पर उसने अपने हाथ से दो-तीन पंक्तियों के नोट्स लिखे। दुकान के बाहर एक सफ़ेद बोर्ड लगवाया। हर सुबह वह उस पर किसी एक किताब का नाम लिखता।

उसके नीचे उस किताब का एक छोटा-सा परिचय। और आख़िर में एक ऐसा वाक्य, जो राह चलते किसी आदमी को रुककर सोचने पर मजबूर कर दे।

धीरे-धीरे लोग उस बोर्ड को पढ़ने के लिए रुकने लगे। फिर दुकान के भीतर आने लगे। कुछ किताबें ख़रीदने। कुछ सिर्फ़ देखने। कुछ घंटों तक बैठकर पढ़ने।

अरविंद ने एक कोना पढ़ने वालों के लिए खाली कर दिया। दो कुर्सियाँ रखीं। फिर चार। फिर एक लंबी मेज़। पानी के लिए एक छोटा कूलर बाहर रख दिया गया जिससे कुछ और लोग भी रुकने लगे।

शकेब हर रोज़ लेखकों, शायरों की तस्वीरें इंटरनेट से प्रिंट करता और उसके बाद उन्हें बाहर लगाता। लोग महान साहित्यकारों की फ़ोटो देखने रुकते, उनके कोट्स पढ़ने के लिए रुकते।

देखते ही देखते दुकान में किताबों पर बातचीत होने लगी। शिमला और आसपास के कॉलेज छात्र आने लगे। शोधार्थी आने लगे। पर्यटक भी मॉल रोड से लौटते हुए वहाँ रुकने लगे।

कई लोग किताबों से ज़्यादा उस सफ़ेद बोर्ड की तस्वीर खींचकर इंस्टाग्राम पर डालते।

अरविंद इस बदलाव से बहुत ख़ुश थे। शुरू में इससे उनकी सेल पर असर नहीं पड़ा लेकिन धीरे धीरे उनकी सेल बढ़ने लगी।

उसे रीलों से नहीं…इस बात से ख़ुशी होती थी कि शायद उनमें से कोई एक आदमी भी किताब लेकर घर जाएगा।

वक़्त धीरे-धीरे बदल रहा था।

अरविंद को अब महसूस होने लगा था कि दुकान सिर्फ़ एक किताबों की दुकान नहीं रही।

वह एक ऐसी जगह बन गई थी जहाँ लोग किताबें ख़रीदने से पहले उनके बारे में बात करते थे।

प्रकाशकों ने भी इस बदलाव पर ध्यान देना शुरू कर दिया।

एक के बाद एक कई प्रकाशकों ने अरविंद से संपर्क किया।

नए लेखक अपनी किताबें ख़ुद लेकर आने लगे।

“अगर हमारी किताब यहाँ रख दी जाए…” वे कहते, “…तो हमें ख़ुशी होगी।”

अरविंद हर बार मुस्कुराकर शकेब की तरफ़ देखता।

अब फ़ैसला ज़्यादातर वही करता था।

कुछ ही महीनों में दुकान में हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू—तीनों भाषाओं की किताबों का बड़ा संग्रह तैयार हो गया।

मीर…

ग़ालिब…

फ़ैज़…

नासिर काज़मी…

परवीन शाकिर…

अब्बास ताबिश…

उनकी किताबें अब दर्शन, इतिहास और उपन्यासों के साथ एक ही छत के नीचे साँस ले रही थीं।

 

अगले भाग के लिए इंतज़ार करें

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