‘तुम्हें ढूँढते हुए’ कहानी का पहला भाग

0
Screenshot

Screenshot

लेखक- अरग़वान रब्बही

सुबह

सुबह के आठ बजने वाले थे। दिल्ली अपनी पूरी रफ़्तार से जाग चुकी थी। सड़कों पर गाड़ियों की लंबी क़तारें थीं। गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ें शोर कर रही थीं।

ऊपर मेट्रो अपने तय वक़्त पर पुल से गुज़र गई। दरवाज़ा बंद होने से पहले कुछ लोग मेट्रो में चढ़ गए, कुछ भीड़ की वजह से रुक गए।

मेट्रो के प्लेटफ़ॉर्म पर एक लड़का और लड़की किसी बात पे बहस कर रहे थे। नीली शर्ट और काली पैंट पहने एक लड़की ने कलाई घड़ी पर नज़र डाली। पास खड़े एक आदमी ने मोबाइल स्क्रीन जलाई। किसी ने बस एक लंबी साँस ली। सीढ़ियों से लगातार लोग प्लेटफ़ॉर्म पर आ रहे थे। अगली मेट्रो प्लेटफ़ॉर्म पर आ लगी। फिर कुछ लोग चढ़े और कुछ लोग प्लेटफ़ॉर्म पर ही रह गए।

एक पति-पत्नी तीन लोगों के बैठने वाली बेंच पर किनारे की सीटों पर बैठे थे, बीच की सीट पर रखा उनका बैग उनकी दूरी का बयान था।

बाहर चाय की दुकानों पर भीड़ थी। चाय की भाप के साथ सिगरेट का धुआँ उड़ रहा था। कहीं पराठे परोसे जा रहे थे तो कोई अपने स्पेशल आमलेट का इंतज़ार कर रहा था। ऑफ़िस जाने वाले लोग जल्दी-जल्दी नाश्ता कर रहे थे।

स्कूल की बसों में बच्चे खिड़की से बाहर झाँक रहे थे। ऑटो रिक्शा बिना पैसेंजर के तेज़ रफ़्तार दौड़ रहा था। डिलीवरी बॉय अपनी मोटरसाइकिलों पर शहर के अलग-अलग हिस्सों में बिखर रहे थे। दिल्ली को किसी का इंतज़ार नहीं था।

वह हर सुबह की तरह आज भी आगे बढ़ रही थी।

लेकिन…

इसी शहर के एक कोने में, चित्तरंजन पार्क की एक शांत गली थी…

गली के बीचोंबीच बने मकान में धूप खिड़की से अंदर दाख़िल हो रही थी। दरवाज़े बंद थे। किचन में एक कप रखा था, गैस स्टोव पे एक ख़ाली पतीली रखी थी। बैठक की मेज़ पर धूल की एक पतली परत जमी हुई थी। कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी।

सिर्फ़ छत का पंखा अपनी धीमी रफ़्तार से घूम रहा था। उसकी हवा से खिड़की का सफ़ेद परदा बार-बार हल्का-सा उठता और फिर वापस अपनी जगह गिर जाता।

लकड़ी की मेज़ लगभग ख़ाली थी। बिस्तर के सिरहाने, हल्के घिसे हुए कवर में लिपटी Notes from Underground रखी थी।

घर ख़ामोश था।

उसी सुबह

मुंबई में सुबह कभी धीरे नहीं होती। वह एक साथ कई दिशाओं से जागती है।

बोरीवली स्टेशन पर लोगों की भीड़ दिख रही थी। चर्चगेट जाने वाली ट्रेन का इंतज़ार हो रहा था। दूसरे प्लेटफ़ॉर्म्स पर ट्रेनें खड़ी थीं लेकिन सबसे ज़्यादा भीड़ चर्चगेट के लिए ही थी।

दूर से आती लोकल ट्रेन की आवाज़ सुनाई देती है। प्लेटफ़ॉर्म पर पहले से खड़ी भीड़ एकाएक आगे खिसकने लगती है। ट्रेन पूरी तरह रुक भी नहीं पाती कि लोग भीतर चढ़ने लगते हैं। जो उतर रहे होते हैं, वे बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। धक्का मुक्की होती है किसी तरह उतरने वाले उतर पाते हैं।

चढ़ने वालों को उतरने वालों की कोई परवाह नहीं थी, उतरने वाले ज़िद, ग़ुस्सा और धक्के का सहारा लेकर किसी तरह उतर पा रहे थे। कुछ ही सेकंड में डिब्बा भर गया, बड़ी संख्या में लोग दरवाज़े पर लटके हुए थे, एक आदमी का एक पाँव ट्रेन के बाहर लटक रहा था, उसने किसी तरह से रेलिंग पकड़ी हुई थी। हॉर्न की आवाज़ हुई, ट्रेन चलने लगी। एक दो लोगों ने बाहर लटके लोगों को अंदर की ओर धक्का दिया कि किसी तरह वो भी लटक पाएँ लेकिन फिर हिम्मत हारकर पीछे हट गए, ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ ली।

ट्रेन के अंदर एक आदमी दरवाज़े पर खड़ा मोबाइल पर ईमेल पढ़ रहा है। एक कॉलेज की लड़की कानों में ईयरफ़ोन लगाए खिड़की के बाहर भागते शहर को देख रही है। एक बुज़ुर्ग आँखें मूँदे रेलिंग पकड़े खड़े हैं- मानो रोज़ का यह सफ़र अब उनके शरीर की आदत बन चुका हो।

उधर सड़कों पर टैक्सियाँ, बसें, ऑटो और मोटरसाइकिलें एक-दूसरे के बीच से रास्ता बनाती चली जा रही थीं।

समुद्र के किनारे सुबह की हवा थी। दादर में एक दुकान पर वड़ा पाव के लिए लाइन लगी थी, चाय की दुकान पर टोकन बंट रहे थे।

फ़्लाई ओवर के नीचे फूल बाज़ार में फूल बेचने वाली औरत अपने गजरे सजा रही थी। एक दूसरी औरत वहाँ रुकी। उसने चमेली का एक छोटा-सा गजरा उठाया। उसे अपनी नाक के पास ले गई। कुछ पल ठहरी। फिर बिना कुछ कहे उसे वापस रख दिया। उसके रखते ही फूल किसी और औरत ने उठा लिया।

सड़क के किनारे दो आवारा कुत्ते कूड़े के ढेर में कुछ तलाश रहे थे। थोड़ी दूर पे एक पुरानी बिल्डिंग टूट रही थी, बग़ल में एक नई बिल्डिंग बन रही थी। कुछ मज़दूर हँसते हुए चाय पी रहे थे।

एक आदमी जल्दी में भाग रहा था। एक औरत फ़ोन पे बात करते हुए रो रही थी। तेज़ रफ़्तार टैक्सी मरीन ड्राइव से गुज़र रही थी।

हज़ारों लोग…

हज़ारों मंज़िलें…

हज़ारों कहानियाँ…

मुंबई किसी एक इंसान के लिए कभी नहीं रुकती। वो दौड़ती है, दौड़ने में कई बार गिरती है, चोट खाती है लेकिन फिर ख़ुद को संभालती है और फिर दौड़ती है।

हर दिन की तरह आज भी मुंबई दौड़ रही थी।

और उसी सुबह..

पहाड़ों के बीच बसा मंडी धीरे-धीरे अपनी आँखें खोल रहा था। रात की ठंडी हवा अभी पूरी तरह गई नहीं थी। पहाड़ियों पर धूप उतरना अभी शुरू ही हुई थी। सुंदरनगर की ओर से आती एक बस शहर में दाख़िल हुई।

उसकी खिड़कियों से बाहर झाँकते चेहरों पर सफ़र की थकान कम और मंज़िल पर पहुँचने की जल्दी ज़्यादा दिखाई देती थी। बस अड्डे पर उतरते ही लोग अपनी-अपनी दिशाओं में बिखर गए।

किसी को पास के गाँव जाना था।

किसी को दफ़्तर।

किसी को अस्पताल।

किसी को कॉलेज।

सड़क किनारे चाय की दुकानों में रौनक हो गई थी। कुछ दुकानदार अपने शटर उठा रहे थे। कोई झाड़ू लगा रहा था। कोई भगवान की छोटी-सी तस्वीर के सामने अगरबत्ती जला रहा था।

सरकारी दफ़्तरों के बाहर कर्मचारी धीरे-धीरे आने लगे। कंधों पर फ़ाइलों से भरे बैग थे। कॉलेज की लड़कियाँ हँसते-बातें करती हुई सड़क पार कर रही थीं। कुछ लड़के उनके पीछे अपने दोस्तों से मज़ाक कर रहे थे।

मंदिर की घंटियाँ पहाड़ों से टकराकर दूर तक फैल रही थीं। गुरुद्वारे से शब्द-कीर्तन की धीमी आवाज़ हवा में घुल रही थी। ब्यास नदी अपने पुराने सलीक़े से बहती जा रही थी। मानो उसे किसी जल्दी का कोई मतलब ही न हो।

यह शहर भागता नहीं था।

चलता था।

धीरे…

अपने समय पर… और अपने स्वभाव से।

———————

और इसी शहर में…

दोपहर के बाद शाम के चार बजने को थे, रिवालसर जाने वाली एक बस पहाड़ी मोड़ों को काटती हुई आगे बढ़ रही थी।

बस की बायीं ओर, गलियारे वाली सीट पर लगभग चालीस साल का एक आदमी बैठा था। उसकी आँखों पर हल्के फ़्रेम का चश्मा था। वह पूरी तल्लीनता से मार्कस ऑरेलियस की Meditations पढ़ रहा था।

उस किताब के नीचे फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की की Notes from Underground दबी हुई थी। दोनों किताबों के बीच से कुछ काग़ज़ और रंग-बिरंगे स्टिकी नोट्स बाहर झाँक रहे थे, जैसे उन्हें कई बार पढ़ा और दुबारा पढ़ा गया हो।

पहाड़ों से टकराकर आती हुई सुनहरी धूप खिड़की से भीतर गिर रही थी। कभी वह किताब के पन्नों पर ठहर जाती, कभी उसके चेहरे पर। बस के अंदर अपनी-अपनी दुनिया बसी हुई थी।

पीछे की सीटों पर कुछ कॉलेज के छात्र धीमे-धीमे हँसते हुए बातें कर रहे थे। आगे एक बुज़ुर्ग दम्पति रिवालसर की झील के क़िस्से बता रहे थे। एक औरत गुरुद्वारे का ज़िक्र कर रही थी। कंडक्टर अगले स्टॉप का नाम पुकारता हुआ टिकट फाड़ रहा था।

बस ने अचानक एक तीखा मोड़ लिया। हल्का-सा झटका लगा। आदमी की गोद में रखी Notes from Underground फिसलकर फ़र्श पर गिर पड़ी। उसने बिना किसी हड़बड़ाहट के अपना चश्मा ठीक किया, झुककर किताब उठाई और उसके कवर पर जमी धूल हाथ से झाड़कर हटा दी।

एक पल के लिए उसकी नज़र किताब के शीर्षक पर ठहर गई।फिर उसने उसे वापस Meditations के नीचे रख दिया।

बस अगले मोड़ की तरफ़ बढ़ चली। सूरज की किरणें पेड़ की परछाईं लेकर बस के अंदर झाँक रही थीं। बस ने एक और मोड़ लिया…

—-

मुंबई

बोरीवली रेलवे स्टेशन से गुज़रती हुई एक बेस्ट बस ट्रैफ़िक के बीच धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

खिड़की के बाहर बारिश के बाद की सड़कें धूप में चमक रही थीं। फुटपाथ पर आम लोग चल रहे थे, किनारे सब्ज़ी वाले अपनी टोकरी लिए बैठे थे, कुछ औरतें हाथ में फूल लिए बेच रही थीं।

ऑटो रिक्शा और बस के लिए लोगों की क़तारें नज़र आ रही थीं। बस की खिड़की के पास लगभग चालीस साल की एक औरत चुपचाप बैठी थी। उसके कंधे पर टंगा हुआ स्लिंग बैग उसकी गोद में रखा था। बैग की ज़िप आधी खुली हुई थी।

अंदर एक मोबाइल फ़ोन, कुछ मेकअप का सामान और एक पुरानी डायरी दिखाई दे रही थी, जिसके कुछ पन्नों के किनारे मुड़ चुके थे।

उसका एक हाथ बैग पर टिका हुआ था। उसी हाथ की अनामिका में एक ख़ूबसूरत अंगूठी चमक रही थी। उसकी नज़र खिड़की के बाहर थी लेकिन ऐसा लगता था, वह सड़क नहीं… कहीं और देख रही है।

बस गोरा गांधी से गोराई की ओर मुड़ी और अगले स्टॉप पर रुक गई। इक्का-दुक्का लोग उतरे, अच्छी ख़ासी भीड़ बस में चढ़ी।

किसी दिन… मंडी में

हर दिन की तरह आज भी अलार्म बजने से कुछ पल पहले ही उसकी आँख खुल है। उसने बिस्तर के किनारे बैठकर अपना चश्मा पहना, कुछ देर खिड़की से बाहर पहाड़ियों की ओर देखा और फिर बाथरूम में चला गया। थोड़ी देर बाद वह मुहल्ले की एक छोटी-सी चाय की दुकान पर पहुँच जाता।

“आइए आइए”

चायवाला उसे पहचानता था। वो भी उसे देखकर सादा सी मुस्कान चेहरे पर ले आया। दो उबले अंडे और एक गिलास चाय लड़के ने उसके सामने मेज़ पर रख दी।

सामने पहाड़ियों पर धीरे-धीरे धूप फैलती जा रही थी।

नाश्ते के बाद वह अपने कमरे में लौटता, नहाता, साफ़ कपड़े पहनता और अलमारी से कोई एक किताब निकालकर अपने पुराने बैग में रख लेता।

कभी Meditations कभी कोई और किताब, और साथ में Notes from Underground…

फिर वह बाज़ार की ओर निकल जाता।

मंडी के पुराने बाज़ार में वह कई दुकानों पर झाड़ू लगाता, फ़र्श पोंछता, कूड़ा बाहर फेंकता, शटर के सामने जमी धूल साफ़ करता और अगले ठिकाने की ओर बढ़ जाता।

दोपहर होते-होते वह पास के एक छोटे-से होटल में पहुँचता।

बिना मेन्यू देखे कहता-

“एक आलू का पराँठा, दही और चाय दीजिएगा।”

होटल वाला मुस्कुराकर ऑर्डर लिख लेता। उसे मालूम था, यह आदमी कभी कुछ और नहीं मँगाता।

शाम तक काम ख़त्म हो जाता। रात का खाना भी उसी होटल में।

ज़्यादातर दिनों में फिर वही –

आलू का पराँठा, कभी-कभी चाय के साथ एक समोसा। फिर वह अपने कमरे में लौट आता।

कुछ देर किताब पढ़ता। खिड़की से बाहर पहाड़ों पर उतरती रात को देखता और बत्ती बुझा देता।

और अगली सुबह…

सब कुछ फिर से वैसे ही शुरू हो जाता। रोज़ इसी तरह से उसका दिन गुज़रता, रोज़ शाम होती और रोज़ रात के बाद ऐसे ही सुबह आ जाती।

किसी दिन…

मंडी शहर के पास एक जगह है रिवालसर, रिवालसर में एक मशहूर झील है जहाँ अक्सर वो दोपहर के बाद जाता, कुछ देर झील के पास बैठता और शाम होते होते वहाँ से लौट आता।

आज भी वो रिवालसर गया था। गुरुद्वारे के पास वो झील के किनारे कुछ देर बैठा, और Notes From Underground पढ़ने लगा। वो अपना ध्यान किताब में लगाए हुए था लेकिन आस पास आते जाते लोग उसे तसल्ली देते थे। आते जाते लोगों की आवाज़ें उसका दिल नर्म करती थीं। कुछ देर किताब पढ़ने के बाद उसने किताब को उँगलियों के दरम्यान बंद कर दिया और उठकर बस स्टॉप की ओर चलने लगा। बस खड़ी थी, बस पर चढ़ गया और किताब खोल ली। कुछ आधे घंटे के बाद वो मंडी शहर पहुँच गया।

शाम हो चुकी थी। मंडी की ठंडी हवा में हल्की-सी नमी घुली हुई थी। बाज़ार का शोर अब धीरे-धीरे थम रहा था। वह रोज़ की तरह चाय की दुकान के बाहर रखी लकड़ी की बेंच पर बैठा था। सामने चाय का गिलास रखा था।

हाथों में फ़्रेडरिक नीत्शे की किताब “On the Genealogy of Morality” खुली थी। वह पढ़ ही रहा था कि एक जानी-पहचानी आवाज़ उसके कानों से टकराई।

“भैया… यहाँ कॉफ़ी मिलेगी क्या?”

उसकी उँगली किताब के पन्ने पर ही ठहर गई। उसने धीरे से सिर उठाया। कुछ क़दम दूर एक औरत खड़ी थी।

कंधे पर एल.वी. का स्लिंग बैग था लेकिन अब बहुत पुराना हो चुका था।

आँखों पर चश्मा…

चेहरे पर सफ़र की थकान…

और आँखों में किसी को ढूँढ लेने की बेचैनी। वह कुछ पल उसे देखता रहा। फिर धीरे से किताब बंद कर दी।

“अस्सलामु अलैकुम।” उसने औरत से मुख़ातिब होते हुए सलाम किया।

औरत ने उसकी तरफ़ देखा।

पहले हैरानी…

फिर पहचान…

और उसके बाद एक लंबी ख़ामोशी।

“वअलैकुम अस्सलाम…”

उसके होंठों से मुश्किल से निकला।

“तुम… यहाँ हो?”

उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह दो क़दम और आगे बढ़ी।

“मैं तुम्हें ढूँढ़ने मुंबई भी गई थी। तुम कहीं नहीं मिले। तुमने तो अम्मी से कहा था ना कि तुम मुंबई जा रहे हो फिर…”

वह चुप रहा।

“मुझे तुमसे बात करनी है…”

वह अपनी बात पूरी नहीं कर सकी। उसने सामने वाली बेंच की ओर इशारा किया।

“बैठ जाओ।”

वह बैठ गई।

दोनों के बीच एक ख़ामोशी भी बैठी हुई थी। कुछ देर इंतज़ार करके उसने कहा-

“मैं जानती हूँ… तुम मुझसे बहुत नाराज़ हो।”

उसने पहली बार उसकी आँखों में देखा।

“मैं नाराज़ नहीं हूँ।”

उसकी आवाज़ में न शिकायत थी… न ताना… और न ही ग़ुस्सा- बस एक मायूसी थी।

कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे।

“तुम्हें फिर से देखने की ख़्वाहिश हुआ करती थी…”

उसने एक पल रुककर उसकी तरफ़ देखा।

“…आज देख लिया।”

उसने उसकी ओर देखते हुए कहा-

“अगर देखना ही था… तो कभी आ जाते।”

उसने जवाब नहीं दिया, सर नीचे किया, किताब उठाई, अपना बैग कंधे पर डाला।

और बहुत सामान्य आवाज़ में कहा-

“अल्लाह हाफ़िज़।”

वह मुड़ा और चल पड़ा।

“सुनो…”

उसने पुकारा।

वह नहीं रुका।

“रुको तो..”

उसकी आवाज़ इस बार और धीमी थी।

 

——————

 

कहानी के अगले भाग का इंतज़ार करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *