तुम्हें ढूँढते हुए… भाग 2: ख़ामोश आवाज़ों क
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तुम्हें ढूँढते हुए… भाग 1 का सारांश
कुछ रिश्ते ख़त्म हो जाते हैं, लेकिन उनकी तलाश कभी ख़त्म नहीं होती।
दिल्ली की ख़ामोशियों, मुंबई की भागती ज़िंदगी और मंडी की पहाड़ियों के बीच शकेब अपनी एक अलग दुनिया बसा चुका है। कभी सॉफ़्टवेयर इंजीनियर रहा शकेब अब किताबों और तन्हाई के बीच सुकून तलाशता है। उसकी ज़िंदगी में Meditations और Notes from Underground की अपनी एक जगह है।
उधर, सबा भी अपनी ज़िंदगी के रास्तों से गुज़रते हुए उसी शख़्स को ढूँढ़ रही है, जिसे कभी उसने ख़ुद से दूर कर दिया था।
मंडी की एक चाय की दुकान पर दोनों अचानक आमने-सामने आ जाते हैं। बरसों की दूरियों के बीच कुछ शब्द कहे जाते हैं, कुछ ख़ामोशियाँ रह जाती हैं और शकेब एक बार फिर आगे बढ़ जाता है।
इसके आगे…
लेकिन वह बिना पीछे देखे पहाड़ी रास्ते पर आगे बढ़ता गया। कुछ ही देर में वह मोड़ के पीछे ओझल हो गया।
औरत कुछ क्षण वहीं खड़ी रही। फिर चाय वाले की तरफ़ मुड़ी।
“भैया… आप इन्हें जानते हैं?”
“हाँ, क्यों नहीं।”
“ये कहाँ रहते हैं?”
चाय वाले ने कहा-
“घर तो नहीं पता मुझे”
वह कुछ पल रुका, फिर बोला-
“लेकिन दिन भर बाज़ार में दुकानों पर सफ़ाई का काम करते हैं। शाम को यहीं चाय पीते हैं।”
औरत जैसे ठीक से सुन ही नहीं पाई।
“सफ़ाई…?”
उसने अनायास दोहराया। उसकी नज़र अपने हाथ में पकड़े महँगे आईफ़ोन पर गई। फिर कंधे से लटकते एल.वी. के बैग पर।
उसने फ़ोन बैग में रख दिया।
बिना कुछ कहे उसी दिशा में चल पड़ी जिधर वह गया था। पहाड़ी रास्ता ख़ाली था। थोड़ी दूर जाकर रास्ता दो हिस्सों में बँट जाता था।
वह दाएँ गई, फिर बाएँ, फिर वापस लौट आई।
वह कहीं नहीं था।
जैसे पहाड़ ने उसे अपनी ख़ामोशी में छिपा लिया हो। उसने देर तक उस सुनसान रास्ते को देखा। अचानक उसके चेहरे का रंग बदलने लगा।
उसकी नज़र उस पहाड़ी रास्ते पर दूर तक टिकी रही, जहाँ कुछ देर पहले वह ओझल हुआ था। शाम धीरे-धीरे उतर आई।
पहाड़ों की चोटियों पर ठहरी धूप पहले सुनहरी हुई, फिर फीकी पड़ गई। बाज़ार की आवाज़ें कम होने लगीं। चाय की दुकान का शटर आधा गिर गया।
और देखते ही देखते शाम, रात में बदल गई।
—
अगले दिन वह फिर उसी चाय की दुकान पर पहुँची। उसने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई, वह नहीं था।
उसने चाय वाले से पूछा-
“आज नहीं आए?”
चाय वाले ने ना में सिर हिलाया।
“आज तो नहीं आए हैं अब तक।”
उसके दिल में एक अजीब-सी बेचैनी उठी। काफ़ी पूछताछ के बाद किसी ने बताया कि वह मंडी के पुराने बाज़ार में मस्जिद के पास किराए के एक छोटे-से कमरे में रहता है।
वह बिना देर किए वहाँ पहुँच गई। कमरे का दरवाज़ा बंद नहीं था।
उसने हल्के से दस्तक दी। कोई जवाब नहीं आया।उसने धीरे से दरवाज़े को धक्का दिया। दरवाज़ा चरमराता हुआ खुल गया।
“शकेब…”
कुछ पल ठहरकर उसने फिर पुकारा—
“शकेब…”
कमरे में सन्नाटा पसरा था। फ़र्श पर एक पतला-सा गद्दा बिछा था। उसके पास एक मोड़ी हुई चादर और तकिया रखा था। खिड़की के सामने लकड़ी की एक मेज़ और एक कुर्सी थी। मेज़ पर कुछ किताबें करीने से रखी थीं।
White Nights…
War and Peace…
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शाइरी
और कुछ किताबें…
किताबों के बीच एक पुराना फ़ाउंटेन पेन और पढ़ने का चश्मा रखा था। कमरे की दीवारें सफ़ेद थीं और किसी भी दीवार पर कोई तस्वीर नहीं थी। कोई कैलेंडर नहीं।
वह बाथरूम तक गई। वहाँ भी कोई नहीं था। कुछ देर तक वह कमरे के बीचोंबीच खड़ी रही।
जैसे उम्मीद कर रही हो कि वह अचानक पीछे से आकर कहे—
“तुम फिर आ गई?”
लेकिन कमरा ख़ामोश था। उसने एक लंबी साँस ली। धीरे से बाहर निकली। दरवाज़ा वैसा ही खुला छोड़ दिया।
उसे मालूम नहीं था कि मेज़ पर रखी डायरी के नीचे एक ख़त दबा हुआ था। वह चली गई।
—-
“अस्सलाम ओ अलैकुम सबा,
मुझे नहीं पता कि तुम यहाँ आओगी भी या नहीं, और आओगी तो ये ख़त तुम्हें मिलेगा भी या नहीं।
तुम बहुत ख़ूबसूरत लग रही थीं, तुम्हें देखकर दिल ख़ुश हो गया।
तुम कह रही थीं कि तुम मुझे ढूँढने मुंबई गई थीं… ना ढूँढा करो मुझे।
अपना ख़याल रखो
अल्लाह हाफ़िज़
~
शकेब”
कुछ साल पहले…
“मुझसे नहीं होगा, शकेब।”
कमरे में लंबी ख़ामोशी छा गई। शकेब ने किताब बंद कर दी। वह कुछ देर तक सबा को देखता रहा।
“क्या नहीं होगा?”
सबा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती।”
शकेब ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस सुनता रहा।
“मैं तुम्हारे साथ ख़ुश नहीं हूँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हें मेरी फ़िक्र नहीं है।”
“ऐसा नहीं है।”
“है।”
उसने गहरी साँस ली।
“तुम मुझसे प्यार नहीं करते।”
शकेब की आवाज़ बहुत धीमी थी।
“मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”
सबा मुस्कुराई। वह मुस्कान ख़ुशी की नहीं थी।
“अगर यही प्यार है… तो मुझे ऐसा प्यार नहीं चाहिए।”
कुछ पल दोनों ख़ामोश रहे।फिर उसने अपना बैग उठाया।
“और एक बात…”
शकेब ने उसकी तरफ़ देखा।
“मैं तुमसे प्यार नहीं करती।”
यह कहते हुए उसकी आवाज़ काँपी थी या नहीं…
शकेब कभी जान नहीं पाया। वह दरवाज़े तक गई।
शकेब ने पहली बार उसे रोकने की कोशिश की।
“सबा…”
वह रुकी लेकिन उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कुछ देर बाद दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई और घर में ऐसी ख़ामोशी फैल गई जो कई साल तक ख़त्म नहीं हुई।
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