तुम्हें ढूँढते हुए (भाग ५) – तुम मेरा इंतज़ार करती हो

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अब तक…

तुम्हें ढूँढते हुए…

यह कहानी है शकेब और सबा की, जो कभी एक-दूसरे के बेहद क़रीब थे, लेकिन अब दो अलग-अलग ज़िंदगियाँ जी रहे हैं।

सबा से अलग होने के बाद शकेब अपनी पुरानी ज़िंदगी छोड़कर हिमाचल के मंडी शहर पहुँच जाता है। कभी सॉफ़्टवेयर इंजीनियर रहा शकेब अब बाज़ार की दुकानों पर सफ़ाई का काम करता है। किताबें उसकी साथी हैं और Notes from Underground उसकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुकी है।

उधर सबा भी अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन शकेब की तलाश उसे मंडी तक ले आती है। बरसों बाद दोनों का सामना एक चाय की दुकान पर होता है। शकेब उससे मिलता है, कुछ बातें होती हैं, लेकिन वह बिना पीछे देखे वहाँ से चला जाता है।

सबा उसे ढूँढते हुए उसके कमरे तक पहुँचती है, मगर वहाँ उसे सिर्फ़ किताबें, ख़ामोशी और एक अधूरा ख़त मिलता है। उस ख़त में शकेब उसकी ख़ूबसूरती की तारीफ़ करता है, लेकिन साथ ही उसे अपनी तलाश छोड़ देने के लिए कहता है।

कहानी फिर अतीत में लौटती है, जहाँ पता चलता है कि सबा ने ही कभी शकेब से कहा था कि वह उसके साथ ख़ुश नहीं है और उससे प्यार नहीं करती।

इसके बाद शकेब मंडी छोड़कर शिमला पहुँच जाता है। वहाँ उसकी मुलाक़ात अरविंद से होती है, जो किताबों की एक दुकान चलाते हैं। शकेब की साहित्य में दिलचस्पी और मेहनत धीरे-धीरे उस दुकान की तस्वीर बदल देती है। वह दुकान अब सिर्फ़ किताबें ख़रीदने की जगह नहीं, बल्कि साहित्य और किताबों से प्रेम करने वालों का एक ठिकाना बनने लगती है।

दूसरी ओर, सबा अपनी पुरानी ज़िंदगी और यादों के बीच अकेली पड़ती जा रही है। उसके पास शकेब की छोड़ी हुई Notes from Underground है, जिसके पन्नों पर उसके निशान और सवाल दर्ज हैं। वह किताब अब उसके लिए दोस्तोयेव्स्की के दर्शन से ज़्यादा शकेब की यादों का हिस्सा है।

चार भागों में शकेब और सबा की ज़िंदगियाँ अलग-अलग रास्तों पर आगे बढ़ती रही हैं। एक ने ख़ामोशी में अपनी दुनिया बना ली है, तो दूसरी उसी ख़ामोशी में अपने अतीत को तलाश रही है।

लेकिन क्या तलाश कभी ख़त्म होती है? या कुछ लोग पूरी ज़िंदगी किसी के लौट आने का इंतज़ार करते रहते हैं?

इसके आगे

अरविंद लाइब्रेरी के इंस्टाग्राम चैनल पर एक्टिविटी बढ़ने लगी। वे अपनी चुनी हुई किताबों की सूची, नई प्रकाशित पुस्तकों की जानकारी और साहित्यिक कार्यक्रमों की सूचना साझा करने लगे।

धीरे-धीरे शिमला आने वाले पर्यटक भी इस जगह का नाम जानने लगे। कुछ किताबें ख़रीदने आते। कुछ घंटों तक बैठकर पढ़ते तो कुछ सिर्फ़ उस सफ़ेद बोर्ड की तस्वीर लेकर लौट जाते, जिस पर हर सुबह शकेब अपने हाथ से किसी एक किताब के बारे में लिखता।

एक दिन अरविंद ने उससे कहा- “तुम रोज़ इतनी दूर से आते-जाते हो।”

शकेब चुप रहा।

“मेरे घर के पास एक छोटा-सा मकान ख़ाली है।”

वह कुछ पल रुके।

“वहीं रह लो। किराए की फ़िक्र मत करना।”

शकेब ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसने सिर्फ़ अरविंद की तरफ़ देखा। अरविंद की चमकदार आँखों में अपनाईयत झलक रही थी। शकेब ने आँखें नीची कर लीं, जाने कितनी बार वो ऐसे मौक़ों पर नज़र चुराने लगता है। कभी आँसू उसकी आँखों में आते तो नहीं लेकिन ये जो नहीं आते ये आँसू अपना घर बनाकर उसकी पलकों के पास ही रहते हैं, हमेशा।

कई साल बाद पहली बार किसी ने उस पर अपनेपन सा हक़ जताते हुआ कुछ कहा था।

कुछ दिनों बाद वह उसी छोटे-से घर में रहने लगा।

रात काफ़ी आगे बढ़ चुकी थी। घर के बाहर पहाड़ों पर ख़ामोशी उतर आई थी। कमरे में सिर्फ़ मेज़ पर रखा टेबल लैंप जल रहा था। उसकी पीली रोशनी किताब के खुले हुए पन्नों पर ठहरी हुई थी।

शकेब चश्मा लगाए पूरी तल्लीनता से Notes from Underground पढ़ रहा था।

वह धीमे-धीमे अंग्रेज़ी में बुदबुदाया-

“I will continue calmly concerning persons with strong nerves who do not understand a certain refinement of enjoyment.”

कुछ देर तक वह उसी पन्ने को देखता रहा।

सुबह की धूप धीरे-धीरे खिड़की से होती हुई शकेब के चेहरे पर उतर आई। मेज़ पर Notes from Underground खुली पड़ी थी। टेबल लैंप अभी भी जल रहा था। गुज़रती रात के बाद ठहरती सुबह का वो आख़िर सपना देख रहा था।

किसी बंद कमरे में उड़ते हुए दरख़्तों के बीच शकेब की आवाज़ गूंज रही थी।

“Come, can a man who attempts to find enjoyment in the very feeling of his own degradation possibly have a spark of respect for himself?”

वो सपने से बाहर आना चाह रहा था लेकिन वो फँस गया था। उसी वक़्त खिड़की से हवा का एक तेज़ झोंका आया। किताब के पन्ने अपने-आप पलटने लगे।

दिल्ली

तेज़ हवा का एक और झोंका रौशनदान से सबा के कमरे में दाख़िल हुआ। उसकी बिखरी ज़ुल्फ़ें चेहरे पर आ गईं। उसने चुपचाप उठकर खिड़की बंद कर दी। कमरे में नज़र दौड़ाने पर लगता था जैसे वक़्त यहाँ धीरे-धीरे ठहर गया हो।

अलमारी कपड़ों से भरी थी…मगर उनमें कोई नया कपड़ा नहीं था। मोबाइल की स्क्रीन कई जगह से टूटी हुई थी। एक कोने में रखा उसका कभी पसंदीदा ब्रांडेड स्लिंग बैग अब टूटी हुई बद्धी के साथ चुपचाप पड़ा था।

पर्दे धुले हुए थे…लेकिन पुराने।

कमरे की लगभग हर चीज़ पर समय की एक पतली-सी परत जम चुकी थी। सिर्फ़ एक चीज़ ऐसी थी जो आज भी वैसी ही सँभालकर रखी गई थी।

Notes from Underground।

उसके लगभग हर पन्ने पर कोई-न-कोई निशान था। कहीं पीले हाईलाइटर की लकीर… कहीं पेंसिल से खींची हुई रेखा…कहीं नीली स्याही में लिखा कोई छोटा-सा सवाल…और कुछ जगहों पर बस एक तारीख़।

किताब अब किताब कम यादों की तरह ज़्यादा लगती थी।

सबा को काली चाय कभी पसंद नहीं थी लेकिन पिछले कुछ महीनों से वह वही पी रही थी। दूध ख़त्म हो जाता तो वह लाने नहीं निकलती। कभी चायपत्ती और गरम पानी ही काफ़ी लगता।

दरअसल…

अब उसे बाहर जाने की कोई जल्दी नहीं रहती थी। न लोगों से मिलने की, न बातें करने की। पिछले चार-पाँच महीनों में उसके घर की चीज़ें ही नहीं…वह ख़ुद भी धीरे-धीरे पुरानी होने लगी थी।

खिड़की के बाहर शाम उतर रही थी।

सबा ने धीरे से Notes from Underground खोली। कई पन्ने पलटने के बाद उसकी नज़र लाल हाईलाइटर से रंगी हुई एक पंक्ति पर ठहर गई।

“I know better than anyone that by all this I am only injuring myself and no one else. But still, if I don’t consult a doctor, it is from spite. My liver is bad-well, let it get worse!”

उसने उँगलियों से उस लाल निशान को छुआ।

और अचानक उसे कई साल पुरानी एक शाम याद आ गई।

शकेब उसी किताब में बड़े ध्यान से कुछ पंक्तियाँ हाईलाइट कर रहा था। वह उसके पास बैठी मुस्कुरा रही थी।

“आख़िर ऐसा क्या है इस किताब में?”

शकेब ने सिर उठाकर उसकी तरफ़ देखा। होंठों पर वही हल्की-सी मुस्कान आई।

“पता नहीं…”

बस इतना कहकर वह फिर किताब में खो गया।

उस दिन भी उसने कुछ नहीं समझाया था।

और आज भी…सबा को इस किताब में कुछ ख़ास समझ नहीं आता था।

उसे दोस्तोयेव्स्की से नहीं…शकेब से लगाव था।

यह किताब उसके लिए किसी फ़लसफ़े की किताब नहीं थी। यह उन चंद जगहों में से एक थी जहाँ शकेब अब भी उससे बातें करता हुआ महसूस होता था। वह कुछ देर तक उसी पन्ने को देखती रही। फिर किताब बंद करके उसे अपनी गोद में रख लिया।

कमरे में फिर वही ख़ामोशी लौट आई। लेकिन इस बार उसे लगा… कुछ ख़ामोशियाँ भी आवाज़ रखती हैं।

धीरे-धीरे सबा को एहसास होने लगा कि उसके पास पैसे ख़त्म होते जा रहे हैं। पिछले कई महीनों से उसने कोई काम नहीं किया था। हर महीने बैंक खाते का बैलेंस थोड़ा और कम हो जाता।

एक सुबह उसने अलमारी खोली। ऊपर वाले खाने से मखमली डिब्बा उतारा। उसमें सोने की दो चूड़ियाँ रखी थीं। शकेब ने शादी की पहली सालगिरह पर उसे दी थीं।

कुछ देर तक वह उन्हें हथेली पर रखे देखती रही। फिर डिब्बा बंद किया, पर्स में रखा और घर से निकल गई। सुनार की दुकान तक पहुँचने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

वह अंदर गई। चूड़ियाँ काउंटर पर रखीं।

सुनार उन्हें देखने ही वाला था कि सबा ने अचानक उन्हें वापस उठा लिया।

“माफ़ कीजिए…”

बस इतना कहकर वह बाहर आ गई। दुकान से निकलते ही उसने चूड़ियों का डिब्बा सीने से लगा लिया।

उसे लगा जैसे वह सोना नहीं बेच रही थी… शकेब की आख़िरी निशानी बेचने जा रही थी।

वह ऐसा नहीं कर सकी।

घर लौटकर उसने बहुत देर तक कमरे को देखा। फिर मोबाइल उठाया।

ओएलएक्स पर पुराने सोफ़े की तस्वीरें डालीं। दो दिन बाद सोफ़ा बिक गया। घर थोड़ा और खाली हो गया। लेकिन चूड़ियाँ अलमारी में उसी जगह रखी रहीं।

कुछ ही दिनों बाद उसने दिल्ली के एक मॉल के शोरूम में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी कर ली।

सुबह समय पर निकलना… शाम को लौट आना…

अब उसकी ज़िंदगी भी एक नए रूटीन में ढलने लगी थी। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि अब वह अपने लिए लगभग कुछ नहीं ख़रीदती थी।

महीने बीतते गए। कभी-कभी बिना किसी को बताए वह दिल्ली से मंडी चली जाती।

वही चाय की दुकान…

वही बाज़ार…

वही रास्ते…

वह हर बार किसी-न-किसी से पूछती—

“शकेब दिखाई दिए क्या?”

हर बार जवाब लगभग एक-सा होता।

“नहीं… कई महीने हो गए।”

शाम तक वह लौटने वाली बस में बैठ जाती।

मंडी पीछे छूट जाता।

और उसके साथ एक और नाकाम कोशिश भी।

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