लखनऊ पर शायरी और बेहतरीन शेर
लखनऊ पर शायरी और बेहतरीन शेर
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को हिंदुस्तान के सबसे तहज़ीब-पसंद शहरों में शुमार किया जाता है। लखनऊ का तहज़ीबी और अदबी इतिहास ख़ासा पुराना है। नवाबों के दौर में यहाँ शेर-ओ-शायरी, मुशायरों और अदबी महफ़िलों को ख़ास मर्तबा हासिल हुआ और लखनऊ धीरे-धीरे उर्दू अदब के एक अहम मरकज़ के रूप में उभरा।
लखनऊ की तहज़ीब का एक अहम हिस्सा उर्दू ज़बान है। यहाँ उर्दू सिर्फ़ बोलचाल की ज़बान नहीं रही, बल्कि उसे बातचीत, शायरी और सामाजिक व्यवहार में नफ़ासत और सलीक़े के साथ बरता गया। उर्दू अदब की पारंपरिक तवारीखी तक़सीम में लखनऊ, दिल्ली, अज़ीमाबाद और रामपुर को उर्दू शायरी के प्रमुख स्कूलों के तौर पर ज़िक्र किया जाता है।
लखनऊ की अदबी दुनिया ने कई अहम शायरों को जन्म दिया और अपने यहाँ जगह दी। मीर अनीस, मिर्ज़ा दबीर, नासिख़, आतिश, मजाज़ और आरज़ू जैसे नाम लखनऊ की साहित्यिक विरासत से गहराई से जुड़े हुए हैं। मीर तकी मीर ने भी अपनी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा लखनऊ में गुज़ारा। विशेष रूप से मर्सिया की शायरी को लखनऊ ने जिस ऊँचाई तक पहुँचाया, उसमें मीर अनीस और मिर्ज़ा दबीर का योगदान अद्वितीय माना जाता है।
यही वह अदबी माहौल था जिसने लखनऊ को महज़ एक शहर नहीं रहने दिया, बल्कि उसे शायरी, तहज़ीब, ज़बान और अदब की एक ख़ास पहचान बना दिया। शायद इसी वजह से लखनऊ का ज़िक्र आते ही उसके साथ शेर-ओ-शायरी और तहज़ीब का ख़याल भी आता है।
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लखनऊ पर मशहूर शेर
लखनऊ है तो महज़ गुम्बद-ओ मीनार नहीं,
सिर्फ एक शहर नहीं, कूचा ओ बाज़ार नहीं
~ योगेश प्रवीन
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कशिश-ए-लखनऊ अरे तौबा
फिर वही हम वही अमीनाबाद
यगाना चंगेज़ी (Yagana Changezi)
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आज कल लखनऊ में ऐ ‘अख़्तर’
धूम है तेरी ख़ुश-बयानी की
वाजिद अली शाह अख़्तर (Wajid Ali Shah Akhtar)
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लखनऊ में फिर हुई आरास्ता बज़्म-ए-सुख़न
बाद मुद्दत फिर हुआ ज़ौक़-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे
चकबस्त ब्रिज नारायण (Chakbast)
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ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है
मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा
चकबस्त ब्रिज नारायण (Chakbast)
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हाल ख़ुश लखनऊ का दिल्ली का
बस उन्हें ‘मुसहफ़ी’ से ख़तरा है
जौन एलिया (Jaun Elia)
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क्या गर्म हैं कि कहते हैं ख़ूबान-ए-लखनऊ
लंदन को जाएँ वो जो फिरंगन के यार हैं
अमीर मीनाई (Ameer Minai)
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किया तबाह तो दिल्ली ने भी बहुत ‘बिस्मिल’
मगर ख़ुदा की क़सम लखनऊ ने लूट लिया
बिस्मिल सईदी (Bismil Saeedi)
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दिल्ली छुटी थी पहले अब लखनऊ भी छोड़ें
दो शहर थे ये अपने दोनों तबाह निकले
मिर्ज़ा हादी रुस्वा (Mirza Hadi Ruswa)
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बड़ी मुश्किल से आते हैं समझ में लखनऊ वाले
दिलों में फ़ासले लब पर मगर आदाब रहता है
मुनव्वर राना (Munavvar Rana)
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नए मिज़ाज के शहरों में जी नहीं लगता
पुराने वक़्तों का फिर से मैं लखनऊ हो जाऊँ
मुनव्वर राना (Munavvar Rana)
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लखनऊ आने का बाइस नहीं खुलता यानी
हवस-ए-सैर-ओ-तमाशा सो वह कम है हम को
मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib)
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याद आता है लखनऊ ‘अख़्तर’
ख़ुल्द हो आएँ तो बुरा क्या है
अख़्तर शीरानी (Akhtar Shirani)
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लखनऊ क्या तिरी गलियों का मुक़द्दर था यही
हर गली आज तिरी ख़ाक-बसर लगती है
जाँ निसार अख़्तर (JaaN Nisar Akhtar)
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यही तशवीश शब-ओ-रोज़ है बंगाले में
लखनऊ फिर कभी दिखलाए मुक़द्दर मेरा
वाजिद अली शाह अख़्तर (Wajid Ali Shah Akhtar)
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तुराब-ए-पा-ए-हसीनान-ए-लखनऊ है ये
ये ख़ाकसार है ‘अख़्तर’ को नक़्श-ए-पा कहिए
वाजिद अली शाह अख़्तर (Wajid Ali Shah Akhtar)
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शफ़क़ से हैं दर-ओ-दीवार ज़र्द शाम-ओ-सहर
हुआ है लखनऊ इस रहगुज़र में पीलीभीत
मीर तक़ी मीर (Meer Taqi Meer)
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अर्ज़-ए-दकन में जान तो दिल्ली में दिल बनी
और शहर-ए-लखनऊ में हिना बन गई ग़ज़ल
गणेश बिहारी तर्ज़ (Ganesh Bihari Tarz)
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‘इक़बाल’ लखनऊ से न दिल्ली से है ग़रज़
हम तो असीर हैं ख़म-ए-ज़ुल्फ़-ए-कमाल के
अल्लामा इक़बाल (Allama Iqbal)
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‘यगाना’ वही फ़ातेह-ए-लखनऊ हैं
दिल-ए-संग-ओ-आहन में घर करने वाले
यगाना चंगेज़ी (Yagana Changezi)
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हो ‘मीर’ का ज़माना कि मौजूदा वक़्त हो
दिल्ली से लखनऊ की हमेशा ठनी रही
उस्मान मीनाई (Usman Minai)
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सुब्ह है बनारस की
शाम-ए-लखनऊ है तू
प्रीतपाल सिंह बेताब (Preetpal Singh Betab)
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तिरे ख़याल तिरी आरज़ू से दूर रहे
नवाब हो के भी हम लखनऊ से दूर रहे
हाशिम रज़ा जलालपुरी (Hashim Raza Jalalpuri)
लखनऊ की पुरानी इमारतों और गलियों की कुछ तस्वीरें







