नुसरत फ़तेह अली ख़ान की गायी ग़ज़लें
सादगी तो हमारी ज़रा देखिए ए’तिबार आप के वा’दे पर कर लिया
बात तो सिर्फ़ इक रात की थी मगर इंतिज़ार आप का उम्र-भर कर लिया
इश्क़ में उलझनें पहले ही कम न थीं और पैदा नया दर्द-ए-सर कर लिया
लोग डरते हैं क़ातिल की परछाईं से हम ने क़ातिल के दिल में भी घर कर लिया
ज़िक्र इक बेवफ़ा और सितमगर का था आप का ऐसी बातों से क्या वास्ता
आप तो बेवफ़ा और सितमगर नहीं आप ने किस लिए मुँह उधर कर लिया
ज़िंदगी-भर के शिकवे गिले थे बहुत वक़्त इतना कहाँ था कि दोहराते हम
एक हिचकी में कह डाली सब दास्ताँ हम ने क़िस्से को यूँ मुख़्तसर कर लिया
बे-क़रारी मिलेगी मुझे न सुकूँ चैन छिन जाएगा नींद उड़ जाएगी
अपना अंजाम सब हम को मालूम था आप ने दिल का सौदा मगर कर लिया
ज़िंदगी के सफ़र में बहुत दूर तक जब कोई दोस्त आया न हम को नज़र
हम ने घबरा के तन्हाइयों से ‘सबा’ एक दुश्मन को ख़ुद हम-सफ़र कर लिया
~ सबा अकबराबादी
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आँख उट्ठी मुहब्बत ने अंगड़ाई ली दिल का सौदा हुआ चाँदनी रात में
उनकी नज़रों ने कुछ ऐसा जादू किया लुट गए हम तो पहली मुलाक़ात में
साथ अपना वफ़ा में न छूटे कभी प्यार की डोर बंध कर न टूटे कभी
छूट जाए ज़माना कोई ग़म नहीं हाथ तेरा रहे बस मिरे हाथ में
रुत है बरसात की देखो ज़िद मत करो रात अँधेरी है बादल हैं छाए हुए
रुक भी जाओ सनम तुम को मेरी क़सम अब कहाँ जाओगे ऐसी बरसात में
है तेरी याद इस दिल में लिपटी हुई हर घड़ी है तसव्वुर तिरे हुस्न का
तेरी उल्फ़त का पहरा लगा है सनम कौन आएगा मेरे ख़यालात में
~ फ़ना बुलंदशहरी
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कहना ग़लत ग़लत तो छुपाना सही सही
क़ासिद कहा जो उस ने बताना सही सही
ये सुब्ह सुब्ह चेहरे की रंगत उड़ी हुई
कल रात तुम कहाँ थे बताना सही सही
दिल ले के मेरा हाथ में कहते हैं मुझ से वो
क्या लोगे इस का दाम बताना सही सही
आँखें मिलाओ ग़ैर से दो हम को जाम-ए-मय
साक़ी तुम्हें क़सम है पिलाना सही सही
ऐ मय-फ़रोश भीड़ है तेरी दुकान पर
गाहक हैं हम भी माल दिखाना सही सही
‘साजिद’ तो जान-ओ-दिल से फ़क़त आप का है बस
क्या आप भी हैं उस के बताना सही सही
~ नामालूम
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ऐसा बनना सँवरना मुबारक तुम्हें कम से कम इतना कहना हमारा करो
चाँद शरमाएगा चाँदनी रात में यूँ न ज़ुल्फ़ों को अपनी सँवारा करो
ये तबस्सुम ये आरिज़ ये रौशन जबीं ये अदा ये निगाहें ये ज़ुल्फ़ें हसीं
आइने की नज़र लग न जाए कहीं जान-ए-जाँ अपना सदक़ा उतारा करो
दिल तो क्या चीज़ है जान से जाएँगे मौत आने से पहले ही मर जाएँगे
ये अदा देखने वाले लुट जाएँगे यूँ न हँस हँस के दिलबर इशारा करो
फ़िक्र-ए-उक़्बा की मस्ती उतर जाएगी तौबा टूटी तो क़िस्मत सँवर जाएगी
तुम को दुनिया में जन्नत नज़र आएगी शैख़ जी मय-कदे का नज़ारा करो
ख़ूबसूरत घटाओं-भरी रात में लुत्फ़ उठाया करो ऐसी बरसात में
जाम ले कर छलकता हुआ हाथ में मय-कदे में भी इक शब गुज़ारा करो
काम आए न मुश्किल में कोई यहाँ मतलबी दोस्त हैं मतलबी यार हैं
इस जहाँ में नहीं कोई अहल-ए-वफ़ा ऐ ‘फ़ना’ इस जहाँ से किनारा करो
~ फ़ना निज़ामी कानपुरी
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है कहाँ का इरादा तुम्हारा सनम किस के दिल को अदाओं से बहलाओगे
सच बताओ कि इस चाँदनी रात में किस से वा’दा किया है कहाँ जाओगे
देखो अच्छा नहीं ये तुम्हारा चलन ये जवानी के दिन और ये शोख़ियाँ
यूँ न आया करो बाल खोले हुए वर्ना दुनिया में बदनाम हो जाओगे
आज जाओ न बेचैन कर के मुझे जान-ए-जाँ दिल दुखाना बुरी बात है
हम तड़पते रहेंगे यहाँ रात-भर तुम तो आराम की नींद सो जाओगे
पास आओ तो तुम को लगाएँ गले मुस्कुराते हो क्यों दूर से देख कर
यूँही गुज़रे अगर ये जवानी के दिन हम भी पछताएँगे तुम भी पछताओगे
बेवफ़ा बे-मुरव्वत है इन की नज़र ये बदल जाएँगे ज़िंदगी लूट कर
हुस्न वालों से दिल को लगाया अगर ऐ ‘फ़ना’ देखो बे-मौत मर जाओगे
~ फ़ना बुलंदशहरी
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मस्त नज़रों से अल्लाह बचाए मह-जमालों से अल्लह बचाए
हर बला सर पे आ जाए मेरी हुस्न वालों से अल्लह बचाए
इन की मा’सूमियत पर न जाना इन के धोके में हरगिज़ न आना
लूट लेते हैं ये मुस्कुरा कर इन की चालों से अल्लह बचाए
भोली सूरत है बातें हैं भोली मुँह में कुछ है मगर दिल में कुछ है
लाख चेहरा सही चाँद जैसा दिल के कालों से अल्लह बचाए
दिल में है ख़्वाहिश-ए-हूर-ओ-जन्नत और ज़ाहिर में शौक़-ए-इबादत
बस हमें शैख़ जी आप जैसे अल्लाह-वालों से अल्लह बचाए
इन की फ़ितरत में है बेवफ़ाई जानती है ये सारी ख़ुदाई
अच्छे-अच्छों को देते हैं धोका भोले-भालों से अल्लह बचाए
~ नामालूम
Nusrat Fateh Ali Khan Shayari