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जितना देखो उसे थकती नहीं आँखें वर्ना
ख़त्म हो जाता है हर हुस्न कहानी की तरह

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ज़ख़्म ही तेरा मुक़द्दर हैं दिल तुझको कौन सँभालेगा
ऐ मेरे बचपन के साथी मेरे साथ ही मर जाना

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मेरे पास से उठ कर वो उसका जाना
सारी कैफ़ियत है गुज़रते मौसम सी
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दिल है कि तिरी याद से ख़ाली नहीं रहता
शायद ही कभी मैंने तुझे याद किया हो

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बड़े अज़ाब में हूँ मुझको जान भी है अज़ीज़
सितम को देख के चुप भी रहा नहीं जाता

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दिल को सँभाले हँसता बोलता रहता हूँ लेकिन
सच पूछो तो ‘ज़ेब’ तबीअत ठीक नहीं होती

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मैं पयम्बर तिरा नहीं लेकिन
मुझसे भी बात कर ख़ुदा मेरे

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घसीटते हुए ख़ुद को फिरोगे ‘ज़ेब’ कहाँ
चलो कि ख़ाक को दे आएँ ये बदन उसका

ये कम है क्या कि मिरे पास बैठा रहता है
वो जब तलक मिरे दिल को दुखा नहीं जाता

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जाग के मेरे साथ समुंदर रातें करता है
जब सब लोग चले जाएँ तो बातें करता है
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तलाश एक बहाना था ख़ाक उड़ाने का
पता चला कि हमें जुस्तुजू-ए-यार न थी

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कुछ दूर तक तो चमकी थी मेरे लहू की धार
फिर रात अपने साथ बहा ले गई मुझे

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छेड़ कर जैसे गुज़र जाती है दोशीज़ा हवा
देर से ख़ामोश है गहरा समुंदर और मैं

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एक किरन बस रौशनियों में शरीक नहीं होती
दिल के बुझने से दुनिया तारीक नहीं होती

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ये डूबती हुई क्या शय है तेरी आँखों में
तिरे लबों पे जो रौशन है उस का नाम है क्या

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अपने बसेरे पंछी लौट न पाया ‘ज़ेब’
शाम घटा भी उट्ठी थी घनघोर बहुत

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