Rukhsar ShayariSahitya Duniya

अभी हैं क़ुर्ब के कुछ और मरहले बाक़ी
कि तुझको पा के हमें फिर तिरी तमन्ना है

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छोटी पड़ती है अना की चादर
पाँव ढकता हूँ तो सर खुलता है

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ज़र्रे में गुम हज़ार सहरा
क़तरे में मुहीत लाख क़ुल्ज़ुम

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देखिए अहल-ए-मुहब्बत हमें क्या देते हैं
कूचा-ए-यार में हम कब से सदा देते हैं

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मुझको अहबाब के अल्ताफ़-ओ-करम ने मारा
लोग अब ज़हर के बदले भी दवा देते हैं

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सब ग़म कहें जिसे कि तमन्ना कहें जिसे
वो इज़्तिराब-ए-शौक़ है हम क्या कहें जिसे

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कुछ कम-निगाहियाँ हैं तजल्ली की आड़ से
ऐसी भी इक निगाह-ए-तमाशा कहें जिसे

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हमा-तन गोश इक ज़माना था
मेरे लब पर तिरा फ़साना था

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वो बहारें भी हम पे गुज़री हैं
जब क़फ़स था न आशियाना था

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