अभी हैं क़ुर्ब के कुछ और मरहले बाक़ी
कि तुझको पा के हमें फिर तिरी तमन्ना है
_______
छोटी पड़ती है अना की चादर
पाँव ढकता हूँ तो सर खुलता है
_______
ज़र्रे में गुम हज़ार सहरा
क़तरे में मुहीत लाख क़ुल्ज़ुम
_______
देखिए अहल-ए-मुहब्बत हमें क्या देते हैं
कूचा-ए-यार में हम कब से सदा देते हैं
_______
मुझको अहबाब के अल्ताफ़-ओ-करम ने मारा
लोग अब ज़हर के बदले भी दवा देते हैं
_______
सब ग़म कहें जिसे कि तमन्ना कहें जिसे
वो इज़्तिराब-ए-शौक़ है हम क्या कहें जिसे
______
कुछ कम-निगाहियाँ हैं तजल्ली की आड़ से
ऐसी भी इक निगाह-ए-तमाशा कहें जिसे
______
हमा-तन गोश इक ज़माना था
मेरे लब पर तिरा फ़साना था
_______
वो बहारें भी हम पे गुज़री हैं
जब क़फ़स था न आशियाना था
