जावेद अख़्तर की शायरी और बेहतरीन शेर

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जावेद अख़्तर हिंदी सिनेमा के चर्चित गीतकार और उर्दू-हिंदी शायरी की परंपरा से जुड़े महत्वपूर्ण लेखक हैं। उनके लिखे शेरों में ज़िंदगी, रिश्तों, अकेलेपन, उम्मीद, संघर्ष और बदलते समय की झलक मिलती है। साहित्य दुनिया के इस संग्रह में जावेद अख़्तर के चुनिंदा और यादगार शेर प्रस्तुत हैं।

जावेद अख़्तर के मशहूर शेर

हम तो बचपन में भी अकेले थे
सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे

जावेद अख़्तर
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डर हमको भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से
लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा

जावेद अख़्तर
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याद उसे भी एक अधूरा अफ़्साना तो होगा
कल रस्ते में उसने हमको पहचाना तो होगा

जावेद अख़्तर
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तब हम दोनों वक़्त चुरा कर लाते थे
अब मिलते हैं जब भी फ़ुर्सत होती है

जावेद अख़्तर
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कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी

जावेद अख़्तर
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तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो

जावेद अख़्तर
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मुझे मायूस भी करती नहीं है
यही आदत तिरी अच्छी नहीं है

जावेद अख़्तर
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जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

जावेद अख़्तर
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ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ाएदे इसमें मगर अच्छा नहीं लगता

जावेद अख़्तर

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मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता

जावेद अख़्तर
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मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था
मिरे अंजाम की वो इब्तिदा थी

जावेद अख़्तर
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इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं
होंठों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं

जावेद अख़्तर
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मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा
वो मुझसे जीत भी सकता था जाने क्यूँ हारा

जावेद अख़्तर

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ज़रा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाख़ों पर नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे
बहुत से ज़र्द चेहरों पर ग़ुबार-ए-ग़म है कम बे-शक पर उन को मुस्कुराने में अभी कुछ दिन लगेंगे

जावेद अख़्तर

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अँधेरे ढल गए रौशन हुए मंज़र ज़मीं जागी फ़लक जागा तो जैसे जाग उट्ठी ज़िंदगानी
मगर कुछ याद-ए-माज़ी ओढ़ के सोए हुए लोगों को लगता है जगाने में अभी कुछ दिन लगेंगे

जावेद अख़्तर
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