तुम्हें ढूँढते हुए (भाग ३) – “फिर तुम्हारी तलाश की मैंने”
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अब तक… | तुम्हें ढूँढते हुए…
लेखक- अरग़वान रब्बही
कभी एक-दूसरे के क़रीब रहे शकेब और सबा आज दो अलग ज़िंदगियाँ जी रहे हैं। मंडी की एक चाय की दुकान पर बरसों बाद उनका सामना होता है। शकेब के भीतर न शिकायत है, न ग़ुस्सा, बस एक गहरी मायूसी। वह सबा से मिलता है, कुछ पल ठहरता है और फिर बिना पीछे देखे चला जाता है।
सबा उसे ढूँढ़ती हुई उसके छोटे-से कमरे तक पहुँचती है, लेकिन वहाँ भी उसे सिर्फ़ ख़ामोशी, किताबें और एक अधूरा ख़त मिलता है। उस ख़त में शकेब की भावनाएँ छिपी हैं, और अतीत में लौटती कहानी उस दिन तक पहुँचती है, जब सबा ने उससे कहा था कि वह उससे प्यार नहीं करती।
अब आगे…
शुरू के कुछ दिनों तक शकेब को यक़ीन था कि वह लौट आएगी। उसने सबा को तरह-तरह से मनाने की कोशिश की लेकिन सबा नाराज़ ही रही। फिर उसका यक़ीन कमज़ोर पड़ने लगा और फिर ये यक़ीन उसके ज़हन में बैठ गया कि सबा वाक़ई उसके साथ ख़ुश नहीं है और अब सबा उसकी ज़िन्दगी में नहीं आएगी।
शकेब अलग थलग रहने लगा, धीरे-धीरे उसने लोगों से मिलना छोड़ दिया। एक रोज़ वो सबा से मिलने उसकी अम्मी के घर गया और सबा की माँ को घर की चाबी दे आया।
“तुम लोगों के बीच सब ठीक तो है ना?”
“जी अम्मी, थोड़ा नाराज़ है सबा”
“कोई बात नहीं, मान जाएगी”
“मैं कुछ दिन के लिए मुंबई जा रहा हूँ, चाबी देने आया था सबा को”
वो घर की चाबी अम्मी को देकर चला आया। आँखों में सूखापन लिए शकेब सारी दुनिया से हार मान चुका था।
वो अपना फ़ोन, लैपटॉप और वे सारी चीज़ें, जो उसे उसकी पुरानी ज़िंदगी से बाँधे हुए थीं, घर में ही छोड़ आया था। कहाँ जाना था पता नहीं लेकिन कहीं तो जाना ही होगा, ये सोचकर वो एक बस में बैठ गया।
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आज…
सुंदरनगर से अंबाला जाने वाली बस सड़क पर तेज़ी से दौड़ रही थी। खिड़की के बाहर पहाड़ नज़र आ रहे थे। शकेब चुपचाप खिड़की से बाहर देख रहा था। उसके पास इस बार कोई किताब नहीं थी। बस एक छोटा-सा बैग था
और एक सफ़र…जिसकी मंज़िल शायद उसे ख़ुद भी नहीं मालूम थी। वो अम्बाला उतर गया। अंबाला पहुँचकर उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने जल्दबाज़ी कर दी थी।
बस अड्डे पर लोग अपनी-अपनी मंज़िलों की तरफ़ भाग रहे थे। किसी को कहीं पहुँचना था। उसे कहीं नहीं पहुँचना था।
वह काफ़ी देर तक एक बेंच पर बैठा लोगों को देखता रहा। फिर उठकर चाय पी। जेब से टिकट निकाली। कुछ देर उसे देखता रहा। और बिना किसी वजह के उसे दो टुकड़ों में फाड़ दिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब कहाँ जाए। शाम होने लगी।
एक बस के आगे बोर्ड लगा था—
“शिमला”
उसने कुछ पल उस बोर्ड को देखा। फिर बिना ज़्यादा सोचे उसी बस में जाकर बैठ गया। बस चल पड़ी।
अंबाला पीछे छूट गया।
इस बार भी उसे नहीं मालूम था कि वह कहाँ जा रहा है।
बस इतना मालूम था… कि जहाँ से भागना चाहता है, वह जगह किसी नक़्शे पर नहीं है।
शिमला पहुँचकर वो कुछ दिन एक छोटे से होटल में रहा और उसके बाद हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के पास एक कमरा किराए पर ले लिया। कमरे में रखने लायक़ सामान भी ज़्यादा नहीं था।
एक गद्दा, एक मेज़ और एक कुर्सी और धीरे-धीरे बढ़ती हुई किताबों की क़तार। मॉल रोड पर एक पुरानी किताबों की दुकान थी। वह अक्सर वहाँ जाता और देर तक रुकता।
घंटों अलमारियों के सामने खड़ा रहता। जिस किताब की तलाश होती, अगर वह न मिलती, तो दुकान वाले को कुछ पैसे एडवांस देकर कहता-
“आ जाए तो संभालकर रखिएगा।”
दुकानदार अब उसे पहचानने लगा था।
उसे मालूम था कि यह आदमी कपड़ों पर कम और किताबों पर ज़्यादा ख़र्च करता है। कपड़े की एक दुकान पर उसे हिसाब-किताब करने का काम मिल गया। वो चुपचाप अपनी ड्यूटी पर सुबह पहुंचता और उसी तरह ड्यूटी ख़त्म करके अपने कमरे में लौट आता।
मेज़ पर एक-एक करके किताबें खुलतीं-
अरस्तू…
इमैनुएल काँट…
स्पिनोज़ा…
कभी-कभी मार्कस ऑरेलियस।
और उन सबके बीच एक किताब हमेशा रहती—
फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की की Notes from Underground।
वह उसे बार-बार पढ़ता।
आख़िरी पन्ना ख़त्म होते ही कुछ दिनों बाद फिर पहला पन्ना खोल देता। जैसे हर बार उसे उम्मीद होती हो कि इस दफ़ा किताब कुछ और कहेगी…या शायद वह ख़ुद कुछ और समझ पाएगा।
और इन सबके बीच सबा, उसे अक्सर याद आ जाती।
कभी चाय बनाते हुए…कभी किसी किताब का पन्ना पलटते हुए…कभी सड़क पर किसी अनजान औरत की हँसी सुनकर…और कभी बिना किसी वजह के। सबा की याद हर बार उसके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान लेकर आती। वह कुछ पल उसे अपने साथ रहने देता।
फिर किताब का अगला पन्ना पलट देता। ज़िंदगी भी शायद इसी तरह आगे बढ़ती है।
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रात काफ़ी हो चुकी थी। सबा बिस्तर पर बैठी अपने मोबाइल की स्क्रीन पर उँगलियाँ फेर रही थी। उसने फ़ेसबुक खोला।
सर्च बार में एक नाम टाइप किया-
शकेब।
कुछ ही पल में उसकी प्रोफ़ाइल सामने थी।
आख़िरी पोस्ट…
दो साल पुरानी।
उसने धीरे-धीरे उसकी पुरानी तस्वीरें देखनी शुरू कीं। कहीं वह दोस्तों के साथ हँस रहा था। कहीं किसी में किताबों की दुकान में खड़ा था। कहीं हाथ में चाय का गिलास लिए कैमरे की तरफ़ मुस्कुरा रहा था।
सबा देर तक उन तस्वीरों को देखती रही।
फिर उसने स्क्रीन पर उभरती उसकी मुस्कुराती हुई तस्वीर को उँगली से हल्के से छुआ।
धीरे से उसके होंठ हिले—
“तुम तो कहते थे कि तुम मुझसे कभी नाराज़ नहीं हो सकते…”
वह कुछ पल रुकी।
“…और अब इतने नाराज़ हो गए, शकेब?”
कोई जवाब नहीं आया।
मोबाइल की स्क्रीन पर वही पुरानी मुस्कान ठहरी रही।
सबा को अचानक महसूस हुआ…तस्वीरों वाला शकेब ज़्यादा बोलता था।
मंडी में मिला शकेब…लगभग ख़ामोश हो चुका था। उसने फ़ोन सीने से लगा लिया। कमरे में सन्नाटा था लेकिन उस सन्नाटे में भी उसे ऐसा लगा, जैसे दो साल पुरानी मुस्कुराहट उससे कुछ कहना चाहती हो।
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