घनी कहानी छोटी शाखा: आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लिखी कहानी “ग्यारह वर्ष का समय” का दूसरा भाग
Sahitya Duniya
(हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है? इस सवाल पर अलग-अलग जानकारों के अलग-अलग मत हैं..और उन मतों के अनुसार ही कुछ कहानियों को हिंदी की पहली कहानी माना जाता है।अभी कुछ दिन “घनी कहानी छोटी शाखा” में हम शामिल कर रहे हैं ऐसी ही कुछ कहानियों को, जो मानी जाती हैं हिंदी की पहली कहानियों में से एक..इन दिनों आप पढ़ रहे हैं, “आचार्य रामचंद्र शुक्ल” की लिखी कहानी “ग्यारह वर्ष का समय” ..आज पढ़िए दूसरा भाग) Acaharya Ram Chandra Shukl Ki Kahani Gyaarah Varsh Ka Samay
ग्यारह वर्ष का समय-आचार्य रामचंद्र शुक्ल
घनी कहानी छोटी शाखा: आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लिखी कहानी “ग्यारह वर्ष का समय” का पहला भाग
भाग-2
(अब तक आपने पढ़ा..लेखक अपने मित्र के साथ वर्षा ऋतु में आसपास टहलने निकलते हैं। रास्ते भर दोनों मित्र तरह-तरह की बातों से मन बहलाते हैं और कुछ समय बाद उन्हें ज्ञात होता है कि वो दोनों ही काफ़ी दूर निकल आये हैं, लेकिन मौसम इतना सुहावना है और दृश्य भी उन्हें लुभाते हैं, वो दोनों कुछ और दूर निकल जाते हैं। संध्या समाप्ति की ओर है और आसमान में चंद्रमा खिल चुका है उसकी रोशनी से ही दोनों मित्र आगे बढ़ते हैं और उन्हें नज़र आता है नगर का वो खंडहर जिससे जुड़ी कई दंतकथाएँ प्रचलित हैं। दोनों ही निर्भीक हैं और उन्हें ये खंडहर आमंत्रण देता प्रतीत होता है..उनके क़दम इस ओर मुड़ जाते हैं। अब आगे..)
कहीं सड़े हुए किवाड़ भूमि पर पड़े प्रचण्ड काल को साष्टांग दण्डवत कर रहे हैं, जिन घरों में किसी अपरिचित की परछाईं पड़ने से कुल की मर्यादा भंग होती थी, वे भीतर से बाहर तक खुले पड़े हैं। रंग-बिरंगी चूड़ियों के टुकड़े इधर-उधर पड़े काल की महिमा गा रहे हैं। मैंने इनमें से एक को हाथ में उठाया, उठाते ही यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि “वे कोमल हाथ कहाँ हैं जो इन्हें धारण करते थे?” Acaharya Ram Chandra Shukl Ki Kahani Gyaarah Varsh Ka Samay
“हा! यही स्थान किसी समय नर-नारियों के आमोद-प्रमोद से पूर्ण रहा होगा और बालकों के कल्लोल की ध्वनि चारों ओर से आती रही होगी, वही आज कराल काल के कठोरदाँतों के तले पिसकर चकनाचूर हो गया है! तृणों से आच्छादित गिरी हुई दीवारें, मिट्टी और ईंटों के ढूह,टूटे-फूटे चौकठे और किवाड़ इधर-उधर पड़े एक स्वर से मानो पुकार के कह रहे थे – “दिनन को फेर होत, मेरु होत माटी को” प्रत्येक पार्श्व से मानो यही ध्वनि आ रही थी। मेरे हृदय में करुणा का एक समुद्र उमड़ा जिसमें मेरे विचार सब मग्न होने लगे।
मैं एक स्वच्छ शिला पर,जिसका कुछ भाग तो पृथ्वीतल में धँसा था, और शेषांश बाहर था, बैठ गया। मेरे मित्र भी आकर मेरे पास बैठे। मैं तो बैठे-बैठे काल-चक्र की गति पर विचार करने लगा; मेरे मित्र भी किसी विचार ही में डूबे थे; किंतु मैं नहीं कह सकता कि वह क्या था। यह सुंदर स्थान इस शोचनीय और पतित दशा को क्यों कर प्राप्त हुआ,मेरे चित्त में तो यही प्रश्न बार-बार उठने लगा; किंतु उसका संतोषदायक उत्तर प्रदान करने वाला वहाँ कौन था? अनुमान ने यथासाध्य प्रयत्न किया, परंतु कुछ फल न हुआ। माथा घूमने लगा। न जाने कितने और किस-किस प्रकार के विचार मेरे मस्तिष्क से होकर दौड़ गए।
हम लोग अधिक विलम्ब तक इस अवस्था में न रहने पाए। यह क्या? मधुसूदन! यह कौन-सा दृश्य है? जो कुछ देखा, उससे अवाक् रह गया! कुछ दूर पर एक श्वेत वस्तु इसी खँडहर की ओर आती दिख पड़ी! मुझे रोमांच हो आया; शरीर काँपने लगा। मैंने अपने मित्र को उस ओर आकर्षित किया और उँगली उठा के दिखाया। परंतु कहीं कुछ न दिख पड़ा; मैं स्थापित मूर्ति की भाँति बैठा रहा। पुन: वही दृश्य ! अबकी बार ज्योत्नावलोक में स्पष्ट रूप से हम लोगों ने देखा कि एक श्वेत परिच्छाद-धारिणी स्त्री एक जल-पात्र लिए खँडहर के एक पार्श्व से होकर दूसरी ओर वेग से निकल गई और उन्हीं खँडहरों के बीच फिर न जाने कहाँ अंतर्धान हो गई।
इस अदृष्ट पूर्व व्यापार को देख मेरे मस्तिष्क में पसीना आ गया और कई प्रकार के भ्रम उत्पन्न होने लगे। विधाता! तेरी सृष्टि में न-जाने कितनी अद्भुत–अद्भुत वस्तु मनुष्य की सूक्ष्म विचार-दृष्टि से वंचित पड़ी हैं। यद्यपि मैंने इस स्थान विशेष के संबंध में अनेक भयानक वार्ताएँ सुन रखी थीं, किंतु मेरे हृदय पर भय का विशेष संचार न हुआ। हम लोगों को प्रेतों पर भी इतना दृढ़ विश्वास न था; नहीं तो हम दोनों का एक क्षण भी उस स्थान पर ठहरना दुष्कर हो जाता। रात्रि भी अधिक व्यतीत होती जाती थी। हम दोनों को अब यह चिंता हुई कि यह स्त्री कौन है?इसका उचित परिशोध अवश्य लगाना चाहिए।
हम दोनों अपने स्थान से उठे और जिस ओर वह स्त्री जाती हुई दीख पड़ी थी उसी ओर चले। अपने चारों ओर प्रत्येक स्थान को भली प्रकार देखते, हम लोग गिरे हुए मकानों के भीतर जा-जा के श्रृगालों के स्वच्छंद विहार में बाधा डालने लगे। अभी तक तो कुछ ज्ञात न हुआ। यह बात तो हम लोगों के मन में निश्चय हो गई थी कि हो न हो, वह स्त्री खँडहर के किसी गुप्त भाग में गई है। गिरी हुई दीवारों की मिट्टी और ईंटों के ढेर से इस समय हम लोग परिवृत्त थे। बाह्य जगत् की कोई वस्तु दृष्टि के अंतर्गत न थी। हम लोगों को जान पड़ता था कि किसी दूसरे संसार में खड़े हैं। Acaharya Ram Chandra Shukl Ki Kahani Gyaarah Varsh Ka Samay
वास्तव में खँडहर के एक भयानक भाग में इस समय हम लोग खड़े थे। सामने एक बड़ी ईंटों की दीवार दिख पड़ी जो औरों की अपेक्षा अच्छी दशा में थी। इसमें एक खुला हुआ द्वार था। इसी द्वार से हम दोनों ने इसमें प्रवेश किया। भीतर एक विस्तृत आँगन था जिसमें बेर और बबूल के पेड़ स्वच्छन्दतापूर्वक खड़े उस स्थान को मनुष्य-जाति-संबंध से मुक्त सूचित करते थे। इसमें पैर धरते ही मेरे मित्र की दशा कुछ और हो गई और वे चट बोल उठे-
“मित्र ! मुझे ऐसा जान पड़ता है कि जैसे मैंने इस स्थांन को और कभी देखा हो, यही नहीं कह सकता, कब। प्रत्येक वस्तु यहाँ की पूर्व परिचित-सी जान पड़ती है।”
मैं अपने मित्र की ओर ताकने लगा। उन्होंने आगे कुछ न कहा। मेरा चित्त इस स्थान के अनुसंधान करने को मुझे बाध्य करने लगा। इधर-उधर देखा तो एक ओर मिट्टी पड़ते-पड़ते दीवार की ऊँचाई के अर्धभाग तक वह पहुँच गई थी। इस पर से होकर हम दोनों दीवार पर चढ़ गए। दीवार के नीचे दूसरे किनारे में चतुर्दिक वेष्टित एक कोठरी दिखाई दी; मैं इसमें उतरने का यत्न करने लगा। बड़ी सावधानी से एक उभरी हुई ईंट पर पैर रखकर हम दोनों नीचे उतर गए। यह कोठरी ऊपर से बिलकुल खुली थी, इसलिए चंद्रमा का प्रकाश इसमें बेरोक-टोक आ रहा था। कोठरी के दाहिनी ओर एक द्वार दिखाई दिया, जिसमें एक जीर्ण किवाड़ लगा हुआ था, हम लोगों ने निकट जाकर किवाड़ को पीछे की ओर धीरे से धकेला तो जान पड़ा कि वे भीतर से बंद हैं।
मेरे तो पैर काँपने लगे। पुन: साहस को धारण कर हम लोगों ने किवाड़ के छोटे-छोटे रन्ध्रों से झाँका तो एक प्रशस्त कोठरी दीख पड़ी। एक कोने में मंद-मंद एक प्रदीप जल रहा था जिसका प्रकाश द्वार तक न पहुँचता था। यदि प्रदीप उसमें न होता तो अंधकार के अतिरिक्त हम लोग और कुछ न देख पाते।
हम लोग कुछ काल तक स्थिर दृष्टि से उसी ओर देखते रहे। इतने में एक स्त्री की आकृति दीख पड़ी जो हाथ में कई छोटे पात्र लिए उस कोठरी के प्रकाशित भाग में आयी। अब तो किसी प्रकार का संदेह न रहा। एक बेर इच्छा हुई कि किवाड़ खटखटाएँ, किंतु कई बातों का विचार करके हम लोग ठहर गये। जिस प्रकार से हम लोग कोठरी में आए थे, धीरे-धीरे उसी प्रकार नि:शब्द दीवार से होकर फिर आँगन में आए।
क्रमशः
घनी कहानी छोटी शाखा: आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लिखी कहानी “ग्यारह वर्ष का समय” का तीसरा भाग
घनी कहानी छोटी शाखा: आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लिखी कहानी “ग्यारह वर्ष का समय” का चौथा भाग
घनी कहानी छोटी शाखा: आचार्य रामचंद्र शुक्ल की लिखी कहानी “ग्यारह वर्ष का समय” का पाँचवा भाग
Acaharya Ram Chandra Shukl Ki Kahani Gyaarah Varsh Ka Samay