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Urdu ke ustaad shayar ki shayari Acharya Chatur Sen Ki KahaniUrdu ke ustaad shayar ki shayari

फंदा- आचार्य चतुरसेन शास्त्री  Acharya Chatur Sen Ki Kahani
घनी कहानी, छोटी शाखा: आचार्य चतुरसेन शास्त्री की कहानी “फंदा” का पहला भाग
घनी कहानी, छोटी शाखा: आचार्य चतुरसेन शास्त्री की कहानी “फंदा” का दूसरा भाग
भाग-3

(अब तक आपने पढ़ा…एक मास्टर साहब पर जर्मनी से षड्यंत्र का आरोप लगने के कारण वो जेल में हैं और घर पर उनकी पत्नी अपने तीन बच्चों के साथ ग़रीबी का सामना कर रही है, जहाँ न उसके पास खाने के लिए कुछ है न बच्चों को खिलाने के लिए ही कुछ है, मकान मालिक भी उन्हें निकालने की बात ही करता है और ऐसे समय में एक मेहमान उनके घर आता है जो झूठी सहानुभूति दिखाता है लेकिन मास्टर साहब की पत्नी उससे बचती है, बातों के दौरान पता चलता है कि वो व्यक्ति मास्टर साहब का भाई है लेकिन उसकी नज़र अपनी भाभी पर है और मास्टर साहब को आरोप में फँसाने में भी उसका हाथ है। वो मदद की बात तो कहता है पर उसके लहजे से उसकी नीयत झलकती है और आख़िरकार मास्टर साहब की पत्नी अपने मान की रक्षा के लिए उसे बाहर का रास्ता दिखाती है। इधर जेल में मास्टर साहब की हालत ख़राब है, भूक-प्यास से व्याकुल और ज्वर से पीड़ित मास्टर साहब को पता चलता है कि उनकी अपील ठुकरा दी गयी है और स्वास्थ्य लाभ होते ही उन्हें फाँसी दी जाएगी..एक हफ़्ते में मास्टर साहब के ठीक होने की बात बताकर डॉक्टर उन्हें बताता है कि उनसे मिलने के लिए उनके बीवी-बच्चे आए हैं..अब आगे..)

दस बज रहे थे। धूप खूब फैली हुई थी। जेल के सदर फाटक पर वह अभागिनी रमणी दोनों बच्चों को साथ लिए बैठी थी। उसे लगभग डेढ़ घंटा हो गया था। वह अपने पति के दर्शन करने आई थी। इतनी देर बाद एक वार्डर उन्हें जेल के भयानक फाटक में लेकर चला।

फाटक को पार करने पर एक अन्धकारपूर्ण दालान में वे लोग चले। वहाँ से एक अँधेरी गली में कुछ देर चल कर एक लोहे का छोटा-सा फाटक वार्डर ने पास के भारी चाबियों के गुच्छे से खोला। इसके बाद वे कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर एक बड़े से गन्दे दालान में पहुँचे। उसके सामने ही बड़े से मकान का पिछवाड़ा था, जिसकी ऊँची और छोटी-छोटी खिड़कियों से कुछ शोर-गुल और बक-झक की आवाज आ रही थी। सामने कुछ कैदी अपनी बेड़ियाँ झनझनाते इधर-उधर जा रहे थे। थोड़ी दूर चलने पर उन्हें अस्पताल की काली इमारत दीख पड़ी, जहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार के रोगी बिछौने पर पड़े थे। कमरे की हवा गर्म और बदबूदार थी। बिस्तरे फटे-कटे, मैले-कुचैले और घृणित थे। यह सब देखते-देखते रमणी का सिर चक्कर खा गया। वह घबराकर वहीँ बैठ गई, यह सब देख छोटी बच्ची रो उठी। थोड़ी देर बाद वह उठी और इस बार स्वामी की कोठरी के पास पहुँच गई। पर भीतर ऑफीसर लोग थे। उसे कुछ देर ठहरना पड़ा। उनके निकलने पर डॉक्टर ने भीतर प्रवेश किया और डॉक्टर ने बाहर आकर उन लोगों को भीतर जाने की इजाज़त दी।

दरवाज़े के निकट जाकर उसके पैर धरती पर जम गए। पहले तो वह पति को देख ही न पाई। पीछे उसने साहस करके एक बार देखा- हाय…यही क्या उसके पतिदेव हैं? जीवन के ग्यारह वर्ष सर्द-गर्म जिनके साथ व्यतीत किए वह उठता हुआ यौवन, वे जीवन की उदीप्त अभिलाषाएँ, वे रस-रहस्य की अमिट रूप रेखाएँ हठपूर्वक एक के बाद एक नेत्रों के सामने आने लगीं। उसकी आँखों में अँधेरा छा गया, वह वहीं बैठ गई।

रोगी ने देखा। उसने चारपाई से उठकर दोनों हाथ फैला कर उन्मत्त की तरह कहा- “आओ बेटा…अरे, तुम इतने ही दिन में बिना बाप के ऐसे हो गए…”- यह कह कर रोगी-कैदी ने अपनी भुजाओं में बच्चे को ज़ोर से लपेट लिया और वह फूट-फूट कर रोने लगा।

सती बैठी ही बैठी आगे बढ़ी। वह पति के दोनों पैर पकड़, उन पर सिर धरकर मूर्च्छित हो गई। वह रो नहीं रही थी। वह संज्ञा-हीन थी। यह सब देख कर छोटी बालिका भी ज़ोर से रो उठी।उसे गोद में लेकर पिता रोना भूल गया। उसकी आँखों में क्षण भर आँख मिला कर वह हँसी थी। अन्त में उसने भर्राई आवाज में कहा-“लीला, मेरी बेटी, मेरी बिटिया…”

इसके बाद उसे छाती से लगा कर क़ैदी चुपचाप रोने लगा। बड़ी देर तक सन्नाटा रहा। फिर बच्चों को अलग करके वह स्वस्थ होकर पत्नी की ओर देखने लगा। बलपूर्वक उसने शोक के उमड़ते वेग को रोका। उसने क्षण भर आकाश में दृष्टि करके एक बार सर्वशक्तिमान परमेश्वर से बल-याचना की। फिर उसने मधुर स्वर में कहा- “इतना अधीर मत हो। ध्यान से मेरी बात सुनो” Acharya Chatur Sen Ki Kahani

रमणी ने सिर नहीं उठाया। पति ने धीरे-धीरे उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- “नादानी न करना, वरना इन बच्चों का कहीं ठिकाना नहीं है। ईश्वर पर विश्वास रखो-मेरा विनोद ब़ड़ा होकर तुम्हारे सभी संकट काटेगा। सब दिन होत न एक समान…”

साध्वी सिसक-सिसक कर रो रही थी। उसे ढाढ़स देना कठिन था, परन्तु अभी कुछ मिनिट प्रथम मृत्यु का सन्देश पाकर भी क़ैदी वह कठिन काम कर रहा था।

वह पूछना चाहती थी- “क्या अब कुछ भी आशा नहीं है?”- परन्तु उसमें बोलने और पति को देखने तक का साहस न था। समस्त साहस बटोरकर उसने एक बार पति की ओर आँख भरकर देखा। वे आँखें आँसू और प्रश्नों से परिपूर्ण, मूक वेदना से अन्धी और मृत अभिलाषाओं की शमशान-भूमि…प्रतिक्षण क्या-क्या कह रही थी?

परन्तु मानव-हृदय जितना सुख में दुर्बल बन जाता है, उतना ही दुख में सबल हो जाता है। मास्टर साहब ने उसका हाथ पक़ड़ कर कहा- “अब इस तरह मुझे देखकर, इस दशा में कायर न बनो…तुम बच्चों की माता हो। जैसे पति की पत्नी रहीं वैसे ही बच्चों की माँ बनना…प्रतीक्षा करो, तुमने मुझे कभी नहीं ठगा, अब भी न ठगना”

सती की वाणी फटी, उसने कहा- “स्वामी…मुझे सहारा दो। मैं चलूँगी, नहीं…मैं चलूँगी”

एक अति मधुर उन्माद उसके होठों पर फड़क रहा था। मास्टर साहब विचलित हुए, उन्होंने संकोच त्याग, धीरे से उस उन्मुख उन्माद का एक सरल चुंबन लिया। वह वासनाहीन, इन्द्रिय-विषय और शरीर-भावना से रहित चुंबन क्या था, दो अमर तत्व प्रतिबिम्बित हो रहे थे।

मास्टर साहब ने कुछ कहने की इच्छा से होंठ खोले थे, पर वार्डर ने कर्कश आवाज में कहा- “चलो, वक़्त हो गया”

रोगी क़ैदी ने मानो धाक खाकर एक बार उसे देखा, और कहा- “ज़रा और ठहर जाओ भाई” Acharya Chatur Sen Ki Kahani

“हुक्म नहीं है”- कहकर वह भीतर घुस आया। उसने एकदम रमणी के सिर पर खड़े होकर कहा- “बाहर जाओ”

लज्जा और संकोच त्याग कर वह कुछ कहा चाहती थी, मास्टर जी ने संकेत से कहा- “उससे कुछ मत कहना..अच्छा…अब विदा प्रिये…बेटे…अम्माँ को दुखी न करना, मेरी बिटिया…”- यह कहकर और एक बार बेसब्री से उन्होंने उसे पकड़ कर अनगिनत चुंबन ले डाले।

रमणी की गम्भीरता अब न रह सकी। वह गाय की तरह डकराती वहीं गिर गई और निष्ठुर वार्डर ने उसे घसीटकर बाहर किया और ताला बन्द कर दिया, दोनों बच्चे चीत्कार कर रो उठे। यह देखकर मास्टर साहब असह्य-वेदना से मूर्च्छित होकर धड़ाम से चारपाई पर गिर पड़े।

रविवार ही की संध्या को इसकी सूचना अभागिनी को दे दी गई थी। वह रात-भर धरती में पड़ी रही, क्षण भर को भी उसकी आँखों में नींद नहीं आई थी। चार दिन से उसने जल की एक बूँद भी मुँह में नहीं डाली थी।

सोमवार को प्रातःकाल बड़ी सर्दी थी। घना कोहरा छाया हुआ था। ठण्डी-ठण्डी हवा चल रही थी। ठीक साढ़े छह बजे का वह समय नियत किया गया था। ठीक समय पर फाँसी का जुलूस अन्ध-कोठरी से चला। मास्टर साहब धीर-गम्भीर गति से आगे बढ़ रहे थे। इस समय उन्होंने हजामत बनवाई थी। वे अपने निजी वस्त्र पहने थे। दूर से देखने में दुर्बल होने के सिवा और कुछ अन्तर न दीखता था। वे मानो किसी गहन विषय को सोचते हुए व्याख्यान देने रंग-मंच पर आ रहे थे। उनके आगे खुली पुस्तक हाथ में लिए पादरी कुछ वाक्य उच्चारण कर रहा था। उनके पीछे जेलर अपनी पूरी पोशाक में थे। उनकी बगल में मैजिस्ट्रेट और डॉक्टर भी चल रहे थे। क्षण भर तख़्ते पर खड़े रहने के बाद जल्लाद ने उनके गले में रस्सी डाल दी। पादरी ने कहा- “मैं प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शाँति प्रदान करे”

मास्टर साहब ने कहा- “चुप रहो, मैं प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर मेरी आत्मा को ज्वलन्त अशान्ति दे, जो तब तक न मिटे, जब तक मेरा देश स्वाधीन न हो जाय, और मेरे देश का प्रत्येक व्यक्ति शान्ति न प्राप्त कर ले”

इसके बाद उन्होंने गीता की पुस्तक को हाथ में लेकर आँखों और मस्तक से लगाया और दोनों हाथों में लेकर पीछे हाथ कर लिए। जल्लाद ने उसी दशा में हाथ पीछे बाँध दिए। मास्टर साहब नेत्र बन्द करके कुछ अस्फुट उच्चारण करने लगे। जल्लाद ने तभी एक काली टोपी से उनका मुँह ढँक दिया, और वह चबूतरे से नीचे कूद पड़ा। पादरी कुछ उच्चारण करने लगे। मैजिस्ट्रेट और जेलर ने टोपियाँ उतार लीं। हठात् तख़्ती  खींच ली गई, और उनका विवश शरीर शून्य में झूलने और छटपटाने लगा। पर थोड़ी देर में आवेग शान्त हो गया।

० ० ०

इस घटना के आधे घंटे  बाद वही पूर्व परिचित भद्र पुरुष (?) लपके हुए, सती की कुटिया पर गए। द्वार खुले थे। भीतर दोनों बच्चे बेतहाशा रो रहे थे, और उनकी माता रसोई के कमरे में एक रस्सी के सहारे निर्जीव लटक रही थी।

समाप्त

Acharya Chatur Sen Ki Kahani

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