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भोलाराम का जीव-हरिशंकर परसाई  Bholaram ka jeev
घनी कहानी, छोटी शाखा: हरिशंकर परसाई की कहानी “भोलाराम का जीव” का पहला भाग
भाग-2 

(अब तक आपने पढ़ा..धर्मराज और चित्रगुप्त इस बात से परेशान हैं कि पृथ्वी से भोलाराम का जीव उसके शरीर से निकल तो गया था लेकिन उसे लेकर दूत अब तक उनके पास नहीं पहुँचा । इसी बीच हाँफता हुआ दूत आकर बताता है कि पृथ्वी से वो भोलाराम का जीव साथ लेकर तो चला था लेकिन रास्ते में कहीं भोलाराम का जीव ग़ायब हो गया, दूत ये भी कहता है कि सारे ब्रह्मांड को छानने के बाद भी उसे भोलराम का जीव नहीं मिला और वो थक हारकर वापस लौटकर आया है। चित्रगुप्त और धर्मराज इसी चिंता में होते हैं कि आख़िर भोलाराम का जीव गया तो गया कहाँ? तभी वहाँ नारद आते हैं और उनसे समस्या का कारण पूछते हैं। सारी बात पता चलते ही नारद ख़ुद पृथ्वीलोक जाकर भोलराम के बारे में पता करने की बात कहते हैं जिस पर सब राज़ी हो जाते हैं। चित्रगुप्त उन्हें भोलाराम के घर का पता बताते हैं और नारद वहाँ पहुँच जाते हैं। भोलराम की पत्नी से मिलकर नारद अभी उससे भोलराम की मृत्यु का कारण पूछते हैं और उनकी पत्नी कहती है कि ग़रीबी के अलावा भोलाराम को और कोई बीमारी नहीं थी, उन्हें पाँच साल से पेंशन नहीं मिली थी..नारद भोलराम की पत्नी से और पूछताछ करते हैं। अब आगे…)  

दुःख की कथा सुनने की फ़ुर्सत नारद को थी नहीं। वे अपने मुद्दे पर आए, “माँ, यह तो बताओ कि यहाँ किसी से उनका विशेष प्रेम था, जिस में उन का जी लगा हो?”
पत्नी बोली – “लगाव तो महाराज, बाल-बच्चों से ही होता है”
“नहीं, परिवार के बाहर भी हो सकता है। मेरा मतलब है, किसी स्त्री…” स्त्री ने गुर्राकर नारद की ओर देखा।

बोली – “अब कुछ मत बको महाराज ! तुम साधु हो, उचक्के नहीं हो। जिंदगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री की ओर आँख उठाकर नहीं देखा”

नारद हँसकर बोले – “हाँ, तुम्हारा यह सोचना ठीक ही है। यही हर अच्छी गृहस्थी का आधार है। अच्छा, माता मैं चला”

स्त्री ने कहा – “महाराज, आप तो साधु हैं, सिद्ध पुरूष हैं। कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उनकी रुकी हुई पेंशन मिल जाए। इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाए”

नारद को दया आ गई थी। वे कहने लगे – “साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहाँ कोई मठ तो है नहीं। फिर भी मैं सरकारी दफ़्तर  जाऊँगा और कोशिश करूँगा”

वहाँ से चल कर नारद सरकारी दफ़्तर पहुँचे। वहाँ पहले ही से कमरे में बैठे बाबू से उन्होंने भोलाराम के केस के बारे में बातें कीं। उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला – “भोलाराम ने दरख़्वास्तें तो भेजी थीं, पर उन पर वज़न नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होंगी”

नारद ने कहा – “भई, ये बहुत से ‘पेपर-वेट’ तो रखे हैं। इन्हें क्यों नहीं रख दिया?”

बाबू हँसा – “आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती। दरख़्वास्तें ‘पेपरवेट’ से नहीं दबतीं। ख़ैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए”

नारद उस बाबू के पास गए। उस ने तीसरे के पास भेजा, तीसरे ने चौथे के पास चौथे ने पाँचवें के पास। जब नारद पच्चीस-तीस बाबुओं और अफ़सरों के पास घूम आए तब एक चपरासी ने कहा – “महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गए। अगर आप साल भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहे, तो भी काम नहीं होगा। आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए। उन्हें ख़ुश कर दिया तो अभी काम हो जाएगा”

नारद बड़े साहब के कमरे में पहुँचे। बाहर चपरासी ऊँघ रहा था। इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं। बिना ‘विजिटिंग कार्ड’ के आया देख साहब बड़े नाराज हुए। बोले – “इसे कोई मन्दिर-वन्दिर समझ लिया है क्या? धड़धड़ाते चले आए! चिट क्यों नहीं भेजी?”

नारद ने कहा – “कैसे भेजता? चपरासी सो रहा है”
“क्या काम है?” साहब ने रौब से पूछा।

नारद ने भोलाराम का पेंशन केस बतलाया। साहब बोले- “आप हैं बैरागी। दफ़्तरों के रीति-रिवाज नहीं जानते। असल में भोलाराम ने ग़लती की। भई, यह भी एक मन्दिर है। यहाँ भी दान-पुण्य करना पड़ता है। आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं। भोलाराम की दरख़्वास्तें उड़ रही हैं, उन पर वज़न रखिए” Bholaram ka jeev

नारद ने सोचा कि फिर यहाँ वज़न की समस्या खड़ी हो गई।
साहब बोले – “भई, सरकारी पैसे का मामला है। पेंशन का केस बीसों दफ़्तरों में जाता है। देर लग ही जाती है। बीसों बार एक ही बात को बीस जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है। जितनी पेंशन मिलती है उतने की स्टेशनरी लग जाती है। हाँ, जल्दी भी हो सकती है मगर…” साहब रुके।

नारद ने कहा – “मगर क्या?”

साहब ने कुटिल मुसकान के साथ कहा, “मगर वज़न चाहिए। आप समझे नहीं। जैसे आपकी यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वज़न भोलाराम की दरख़्वास्त पर रखा जा सकता है। मेरी लड़की गाना बजाना सीखती है। यह मैं उसे दे दूँगा। साधु-संतों की वीणा से तो और अच्छे स्वर निकलते हैं”

नारद अपनी वीणा छिनते देख ज़रा घबराए। पर फिर संभलकर उन्होंने वीणा को टेबल पर रख कर कहा – “यह लीजिए। अब ज़रा जल्दी उसकी पेंशन ऑर्डर निकाल दीजिए”

साहब ने प्रसन्नता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घंटी बजाई। चपरासी हाज़िर हुआ। साहब ने हुक़्म दिया – “बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फ़ाइल लाओ”

थोड़ी देर बाद चपरासी भोलाराम की सौ-डेढ़-सौ दरख़्वास्तों से भरी फ़ाइल ले कर आया। उसमें पेंशन के काग़ज़ात भी थे। साहब ने फ़ाइल पर नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा – “क्या नाम बताया साधु जी आपने?”

नारद समझे कि साहब कुछ ऊँचा सुनता है। इसलिए ज़ोर से बोले – “भोलाराम!”

सहसा फ़ाइल में से आवाज आई – “कौन पुकार रहा है मुझे।पोस्टमैन है? क्या पेंशन का ऑर्डर आ गया?”

नारद चौंके। पर दूसरे ही क्षण बात समझ गए। बोले – “भोलाराम ! तुम क्या भोलाराम के जीव हो?”

“हाँ ! आवाज आई”

नारद ने कहा – “मैं नारद हूँ। तुम्हें लेने आया हूँ। चलो स्वर्ग में तुम्हारा इंतजार हो रहा है” आवाज़ आई -“मुझे नहीं जाना, मैं तो पेंशन की दरख़्वास्तों पर अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता”

समाप्त
Bholaram ka jeev

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