कोलुशा – मैक्सिम गोर्की

मैक्सिम गोर्की की कहानी – कोलुशा क़ब्रिस्तान का वह कोना, जहाँ भिखारी दफ़नाये जाते हैं। पत्तों से छितरे, बारिश से बहे और आँधियों से जर्जर क़ब्रों के ढूहों के बीच, दो मरियल-से बर्च वृक्षों के जालीदार साये में, जिघम के फटे-पुराने कपड़े पहने और सिर पर काली शॉल डाले एक स्त्री एक क़ब्र के पास … Read more

दुनिया की रिवायात से बेगाना नहीं हूँ – शकील बदायूँनी

Aaj Phir Gardish e Taqdeer Pe Rona Aaya - Shakeel Budanyuni Shakeel Badayuni Shayari

दुनिया की रिवायात से बेगाना नहीं हूँ छेड़ो न मुझे मैं कोई दीवाना नहीं हूँ इस कसरत-ए-ग़म पर भी मुझे हसरत-ए-ग़म है जो भर के छलक जाए वो पैमाना नहीं हूँ रूदाद-ए-ग़म-ए-इश्क़ है ताज़ा मिरे दम से उनवान-ए-हर-अफ़्साना हूँ अफ़्साना नहीं हूँ इल्ज़ाम-ए-जुनूँ दें न मुझे अहल-ए-मोहब्बत मैं ख़ुद ये समझता हूँ कि दीवाना नहीं … Read more

वो हँसती है तो उसके हाथ रोते हैं – अब्बास ताबिश

किसी के ब’अद
अपने हाथों की बद-सूरती में खो गई है वो

मुझे कहती है ‘ताबिश’! तुमने देखा मेरे हाथों को
बुरे हैं नाँ?

अगर ये ख़ूबसूरत थे तो इनमें कोई बोसा क्यूँ नहीं ठहरा”
अजब लड़की है

पूरे जिस्म से कट कर फ़क़त हाथों में ज़िंदा है
सुराही-दार गर्दन नर्म होंटों तेज़ नज़रों से वो बद-ज़न है

कि इन अपनों ने ही उसको सर-ए-बाज़ार फेंका था
कभी आँखों में डूबी

और कभी बिस्तर पे सिलवट की तरह उभरी
अजब लड़की है

ख़ुद को ढूँढती है
अपने हाथों की लकीरों में

जहाँ वो थी न है, आइंदा भी शायद नहीं होगी
वो जब उँगली घुमा कर

‘फ़ैज़’ की नज़्में सुनाती है
तो इसके हाथ से पूरे बदन का दुख झलकता है

वो हँसती है तो उसके हाथ रोते हैं
अजब लड़की है

पूरे जिस्म से कट कर फ़क़त हाथों में ज़िंदा है

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हवा का लम्स जो अपने किवाड़ खोलता है – मोहसिन नक़वी

हवा का लम्स जो अपने किवाड़ खोलता है तो देर तक मिरे घर का सुकूत बोलता है हम ऐसे ख़ाक-नशीं क्या लुभा सकेंगे उसे वो अपना ‘अक्स भी मीज़ान-ए-ज़र में तोलता है जो हो सके तो यही रात ओढ़ ले तन पर बुझा चराग़ अँधेरे में क्यों टटोलता है उसी से माँग लो ख़ैरात अपने … Read more

बहनें – असद ज़ैदी

कोयला हो चुकी हैं हम बहनों ने कहा रेत में धँसते हुए ढक दो अब हमें चाहे हम रुकती हैं यहाँ, तुम जाओ बहनें दिन को हुलिए बदलकर आती रहीं बुख़ार था हमें शामों में हमारी जलती आँखों को और तपिश देती हुई बहनें शाप की तरह आती थीं हमारी बर्राती हुई ज़िंदगियों में बहनें … Read more

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है – मिर्ज़ा ग़ालिब

Ghalib Ke Baare Mein Parag Agrawal Ghalib Aur Zauq ki Ghazalen Baazeecha E Atfal Ghalib Aaina Kyun Na Doon Aah Ko Chahiye Ik

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है न शो’ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंद-ख़ू क्या है ये रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुम से वगर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है चिपक रहा है बदन पर लहू … Read more

बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए – परवीन शाकिर

Parveen Shakir Best Sher

बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए मौसम के हाथ भीग के सफ़्फ़ाक हो गए बादल को क्या ख़बर है कि बारिश की चाह में कैसे बुलंद-ओ-बाला शजर ख़ाक हो गए जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए लहरा रही है बर्फ़ की चादर … Read more

हम देखेंगे – फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिसका वादा है जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ रूई की तरह उड़ जाएँगे हम महकूमों के पाँव-तले जब धरती धड़-धड़ धड़केगी और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से सब बुत उठवाए जाएँगे हम अहल-ए-सफ़ा … Read more

रोटी और संसद – धूमिल

एक आदमी रोटी बेलता है एक आदमी रोटी खाता है एक तीसरा आदमी भी है जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है मैं पूछता हूँ— ‘यह तीसरा आदमी कौन है?’ मेरे देश की संसद मौन है। — धूमिल

भगवान के डाकिए – रामधारी सिंह दिनकर

पक्षी और बादल, ये भगवान के डाकिए हैं, जो एक महादेश से दूसरे महादेश को जाते हैं। हम तो समझ नहीं पाते हैं मगर उनकी लाई चिट्ठियाँ पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बाँचते हैं। हम तो केवल यह आँकते हैं कि एक देश की धरती दूसरे देश को सुगंध भेजती है। और वह सौरभ हवा … Read more