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Ishq ki shayari Kaifi Azmi Shayari Hindi Noshi Gilani Shayari Qateel Shifai Daagh Dehlvi Hari Shankar Parsai Jaishankar Prasad Amrita Pritam Ki Kahani Vrahaspativar ka vrat ~ "बृहस्पतिवार का व्रत" Rajendra Bala Ghosh Ki Kahani Dulaiwalisahitya duniya

Rajendra Bala Ghosh Ki Kahani Dulaiwali ~ (हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है? इस सवाल पर अलग-अलग जानकारों के अलग-अलग मत हैं..और उन मतों के अनुसार ही कुछ कहानियों को हिंदी की पहली कहानी माना जाता है। कुछ दिनों से आप “घनी कहानी छोटी शाखा” में पढ़ रहे हैं, ऐसी ही कुछ कहानियों को, जो मानी जाती हैं हिंदी की पहली कहानियों में से एक..इन दिनों आप पढ़ रहे हैं “बंग महिला राजेंद्रबाला घोष” की लिखी कहानी “दुलाईवाली”..आज पढ़िए तीसरा और अंतिम भाग)

दुलाई वाली- बंग महिला राजेंद्र बाला घोष
घनी कहानी, छोटी शाखा: बंग महिला राजेंद्रबाला घोष की लिखी कहानी “दुलाईवाली” का पहला भाग
घनी कहानी, छोटी शाखा: बंग महिला राजेंद्रबाला घोष की लिखी कहानी “दुलाईवाली” का दूसरा भाग
 भाग-3

(अब तक आपने पढ़ा…बंशीधर अपनी ससुराल बनारस से अपनी पत्नी जानकी को जल्दी विदा करा लाते हैं क्योंकि उनके ममेरे भाई और बहुत अच्छे मित्र नवलकिशोर ने उन्हें मिलने और साथ ही चलने की बात लिखी होती है। लेकिन नवलकिशोर उन्हें स्टेशन पर नहीं मिलता, अब ट्रेन को छोड़ना उचित न समझते हुए बंशीधर पत्नी को जनाने डिब्बे में बिठाकर ख़ुद दूसरे डिब्बे में सवार होते हैं। बीच के स्टेशन पर दुलाई ओढ़ी एक महिला भी उसी डिब्बे में बैठती है लेकिन गाड़ी चलते ही उसके हावभाव बताते हैं कि उसके साथ आया आदमी स्टेशन पर ही रह गया। डिब्बे के सभी यात्री अपनी-अपनी ऐसे कहानियों और बातों से उस महिला को परेशान करते हैं। इसी बीच बंशीधर उस महिला को ढाढ़स बँधाते हैं कि वो इलाहाबाद में उस महिला की मदद कर देंगे और उनके साथ भी महिला यात्री है..किंतु उन्हें उस महिला का बार-बार उनकी ओर ताकना खटकता है। अब आगे….)   ~ Rajendra Bala Ghosh Ki Kahani Dulaiwali

गाड़ी इलाहाबाद के पास पहुँचने को हुई। बंशीधर उस स्त्री को धीरज दिलाकर आकाश-पाताल सोचने लगे। यदि तार में कोई खबर न आयी होगी तो दूसरी गाड़ी तक स्टेशन पर ही ठहरना पड़ेगा। और जो उससे भी कोई न आया तो क्या करूँगा? जो हो गाड़ी नैनी से छूट गयी। अब साथ की उन अशिक्षिता स्त्रियों ने फिर मुँह खोला, “क भइया, जो केहु बिना टिक्कस के आवत होय तो ओकर का सजाय होला?अरे ओंका ई नाहीं चाहत रहा कि मेहरारू के तो बैठा दिहलेन, अउर अपुआ तउन टिक्कस लेई के चल दिहलेन!”

किसी-किसी आदमी ने तो यहाँ तक दौड़ मारी की रात को बंशीधर इसके जेवर छीनकर रफूचक्कर हो जाएँगे। उस गाड़ी में एक लाठीवाला भी था, उसने खुल्लमखुल्ला कहा, “का बाबू जी! कुछ हमरो साझा!”

इसकी बात पर बंशीधर क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने इसे खूब धमकाया। उस समय तो वह चुप हो गया, पर यदि इलाहाबाद उतरता तो बंशीधर से बदला लिए बिना न रहता। बंशीधर इलाहाबाद में उतरे। एक बुढ़िया को भी वहीं उतरना था। उससे उन्होंने कहा कि, “उनको भी अपने संग उतार लो”-

फिर उस बुढ़िया को उस स्त्री के पास बिठाकर आप जानकी को उतारने गये। जानकी से सब हाल कहने पर वह बोली, “अरे जाने भी दो; किस बखेड़े में पड़े हो।” पर बंशीधर ने न माना।

जानकी को और उस भद्र महिला को एक ठिकाने बिठाकर आप स्टेशन मास्टर के पास गये। बंशीधर के जाते ही वह बुढ़िया, जिसे उन्होंने रखवाली के लिए रख छोड़ा था, किसी बहाने से भाग गयी। अब तो बंशीधर बड़े असमंजस में पड़े। टिकट के लिए बखेड़ा होगा। क्योंकि वह स्त्री बे-टिकट है। लौटकर आये तो किसी को न पाया।

“अरे ये सब कहाँ गयीं?”- यह कहकर चारों तरफ देखने लगे। कहीं पता नहीं। इस पर बंशीधर घबराये,

“आज कैसी बुरी साइत में घर से निकले कि एक के बाद दूसरी आफत में फँसते चले आ रहे हैं।”

इतने में अपने सामने उस ढुलाईवाली को आते देखा। “तू ही उन स्त्रियों को कहीं ले गयी है,” इतना कहना था कि दुलाई से मुँह खोलकर नवलकिशोर खिलखिला उठे।

“अरे यह क्या? सब तुम्हारी ही करतूत है! अब मैं समझ गया। कैसा ग़ज़ब तुमने किया है? ऐसी हँसी मुझे नहीं अच्छी लगती। मालूम होता कि वह तुम्हारी ही बहू थी। अच्छा तो वे गयीं कहाँ?”

“वे लोग तो पालकी गाड़ी में बैठी हैं। तुम भी चलो।”

“नहीं मैं सब हाल सुन लूँगा तब चलूँगा। हाँ, यह तो कहे, तुम मिरजापुर में कहाँ से आ निकले?”

“मिरजापुर नहीं, मैं तो कलकत्ते से, बल्कि मुगलसराय से, तुम्हारे साथ चला आ रहा हूँ। तुम जब मुगलसराय में मेरे लिए चक्कर लगाते थे तब मैं ड्योढ़े दर्जे में ऊपरवाले बेंच पर लेटे तुम्हारा तमाशा देख रहा था। फिर मिरजापुर में जब तुम पेट के धंधे में लगे थे, मैं तुम्हारे पास से निकल गया पर तुमने न देखा, मैं तुम्हारी गाड़ी में जा बैठा। सोचा कि तुम्हारे आने पर प्रकट होऊँगा। फिर थोड़ा और देख लें, करते-करते यहाँ तक नौबत पहुँची। अच्छा अब चलो, जो हुआा उसे माफ़ करो”

यह सुन बंशीधर प्रसन्न हो गये। दोनों मित्रों में बड़े प्रेम से बातचीत होने लगी। बंशीधर बोले, “मेरे ऊपर जो कुछ बीती सो बीती, पर वह बेचारी, जो तुम्हारे-से गुनवान के संग पहली ही बार रेल से आ रही थी, बहुत तंग हुई, उसे तो तुमने नाहक रूलाया। बहुत ही डर गयी थी”

“नहीं जी! डर किस बात का था? हम-तुम, दोनों गाड़ी में न थे?”

“हाँ पर, यदि मैं स्टेाशन मास्टर से इत्तिला कर देता तो बखेड़ा खड़ा हो जाता न?”

“अरे तो क्या, मैं मर थोड़े ही गया था! चार हाथ की दुलाई की बिसात ही कितनी?”

इसी तरह बातचीत करते-करते दोनों गाड़ी के पास आये। देखा तो दोनों मित्र-बधुओं में खूब हँसी हो रही है। जानकी कह रही थी – “अरे तुम क्या जानो, इन लोगों की हँसी ऐसी ही होती है। हँसी में किसी के प्राण भी निकल जाएँ तो भी इन्हें दया न आवे।”

खैर, दोनों मित्र अपनी-अपनी घरवाली को लेकर राजी-खुशी घर पहुँचे और मुझे भी उनकी यह राम-कहानी लिखने से छुट्टी मिली।

समाप्त ~ Rajendra Bala Ghosh Ki Kahani Dulaiwali

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