मजरूह सुल्तानपुरी की ग़ज़लें
Majrooh Sultanpuri Ki Ghazal ग़ज़ल 1 डरा के मौज ओ तलातुम से हम-नशीनों को यही तो हैं जो डुबोया किए सफ़ीनों को शराब हो ही गई है ब-क़द्र-ए-पैमाना ब-अज़्म-ए-तर्क निचोड़ा जब आस्तीनों को जमाल-ए-सुब्ह दिया रू-ए-नौ-बहार दिया मिरी निगाह भी देता ख़ुदा हसीनों को हमारी राह में आए हज़ार मय-ख़ाने भुला सके न मगर होश … Read more