अलफ़ाज़ की बातें (1): ज़रा ध्यान से “ख़ू” को “ख़ूं” ना समझ लीजियेगा…

हर ज़बान में कुछ ऐसे लफ़्ज़ होते हैं जो बोलने में लगभग एक से सुनाई देते हैं लेकिन मा’नी में अलग होते हैं. हालाँकि ये लफ़्ज़ बोलने में भी अलग ही होते हैं लेकिन सुनते वक़्त कोई कम ध्यान लगाए तो एक से लग जाएँ.ऐसे ही लफ़्ज़ों के दो जोड़े हम आज अपनी बातचीत में शामिल कर रहे हैं.

ख़ू – आदत (habit)
ख़ूं – ख़ून (blood)

मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शे’र में “ख़ू” का इस्तेमाल किया गया है. देखें,
“हम भी तस्लीम की ख़ू डालेंगे,
बे-नियाज़ी तिरी आदत ही सही”

हबीब अहमद सिद्दीक़ी का ये शे’र देखें, इसमें उन्होंने “ख़ूं” लफ़्ज़ का इस्तेमाल किया है.
“हज़ारों तमन्नाओं के ख़ूं से हमने,
ख़रीदी है इक तोहमत-ए-पारसाई”


मै (मय) – शराब (alcohol)
मैं – मैं (I//me)

हफ़ीज़ जालंधरी के शे’र में “मै’ शब्द का इस्तेमाल देखिये..
इन तल्ख़ आँसुओं को न यूँ मुँह बना के पी,
ये मै है ख़ुद-कशीद इसे मुस्कुरा के पी

अहमद फ़राज़ के शे’र में “मैं” का इस्तेमाल देखिये…

मैं कि सहरा-ए-मुहब्बत का मुसाफ़िर था ‘फ़राज़’,
एक झोंका था कि ख़ुश्बू के सफ़र पर निकला

About साहित्य दुनिया

View all posts by साहित्य दुनिया →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *