महिला दिवस पर बेहतरीन शेर..
Good Neighbours (or Gossip), 1885 painting by John William Waterhouse
Women’s Day Shayari
तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
____________
शहर का तब्दील होना शाद रहना और उदास
रौनक़ें जितनी यहाँ हैं औरतों के दम से हैं
मुनीर नियाज़ी
__________
घटा देख कर ख़ुश हुईं लड़कियाँ
छतों पर खिले फूल बरसात के
मुनीर नियाज़ी
_________
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया
साहिर लुधियानवी
____________
एक के घर की ख़िदमत की और एक के दिल से मुहब्बत की
दोनों फ़र्ज़ निभा कर उसने सारी उम्र इबादत की
ज़ेहरा निगाह
____________
जवान गेहूँ के खेतों को देख कर रो दें
वो लड़कियाँ कि जिन्हें भूल बैठीं माएँ भी
किश्वर नाहीद
_________
बंद होती किताबों में उड़ती हुई तितलियाँ डाल दीं
किसकी रस्मों की जलती हुई आग में लड़कियाँ डाल दीं
नोशी गिलानी
_________
सुब्ह का झरना हमेशा हँसने वाली औरतें
झुटपुटे की नद्दियाँ ख़ामोश गहरी औरतें
बशीर बद्र
____________
सड़कों बाज़ारों मकानों दफ़्तरों में रात दिन
लाल नीली सब्ज़ नीली जलती बुझती औरतें
बशीर बद्र
___________
सैकड़ों ऐसी दुकानें हैं जहाँ मिल जाएँगी
धात की पत्थर की शीशे की रबड़ की औरतें
बशीर बद्र
_________
ग़ौर से सूरज निकलते वक़्त देखो आसमाँ
चूमती हैं किस का माथा उजली लम्बी औरतें
बशीर बद्र
___________
जिसको तुम कहते हो ख़ुश-बख़्त सदा है मज़लूम
जीना हर दौर में औरत का ख़ता है लोगो
रज़िया फ़सीह अहमद
________
लड़कियाँ बैठीं थीं पाँव डाल के,
रौशनी सी हो गई तालाब में
परवीन शाकिर
___________
तुम भी आख़िर हो मर्द क्या जानो
एक औरत का दर्द क्या जानो
सैयदा अरशिया हक़
___________
हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँ
दो घड़ी की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं
परवीन शाकिर
_________
Women’s Day Shayari