अब वो मंजर, ना वो चेहरे ही नज़र आते हैं
मुझको मालूम ना था ख्वाब भी मर जाते हैं

जाने किस हाल में हम हैं कि हमें देख के सब
एक पल के लिये रुकते हैं गुज़र जाते हैं

साकिया तूने तो मयख़ाने का ये हाल किया
रिन्द अब मोहतसिबे-शहर के गुण गाते हैं

जैसे तजदीदे-तअल्लुक की भी रुत हो कोई
ज़ख्म भरते हैं तो ग़म-ख़्वार भी आ जाते हैं

एहतियात अहले-मुहब्बत कि इसी शहर में लोग
गुल-बदस्त आते हैं और पा-ब-रसन जाते हैं

~ अहमद फ़राज़

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