ये ज़ाफ़रानी पुलोवर उसी का हिस्सा है,
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे
बशीर बद्र
——
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
बशीर बद्र
—
दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
जिगर मुरादाबादी
—-
दश्त में आख़िरी तमन्ना की
और फिर ये हुआ कि तुम आए
अरग़वान
—-
ख़्वाब में ख़्वाब की ज़मीनों पर,
दिल उड़ा जा रहा है आहिस्ता
अरग़वान
——
फूल का रास्ता मुहब्बत है,
ख़्वाब का सिलसिला मुहब्बत है
अरग़वान
—-
दो दिलों की हज़ार बातों का,
आख़िरी फ़ैसला मुहब्बत है
अरग़वान
——
क़िस्से कहानियों में हमारी तरह के लोग,
अपनी तरह के इश्क़ में मर मिट के रह गए
अरग़वान
—-
हम दिल्ली भी हो आए हैं, लाहौर भी घूमे
ए यार मगर तेरी गली तेरी गली है
बशीर बद्र
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ज़रा सी बात का इतना मलाल करते हो,
शिकायतें भी वहीं हैं जहाँ मुहब्बत है
बशीर बद्र
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बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना,
तिरी ज़ुल्फ़ों का पेंचो ख़म नहीं है
मजाज़
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आज वो इस राह से गुज़रा है,
आज मैं फ़र्श ना धोना चाहूँ
हुमैरा रहमान
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हम हुए तुम हुए कि मीर हुए,
उसकी ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
मीर तक़ी मीर
——-
क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो,
ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने सो
मियाँदाद ख़ाँ सैय्याह
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यार से छेड़ चली जाए ‘असद’
गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही
मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib)
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गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
—
तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता
मिरी तरह तिरा दिल बेक़रार है कि नहीं
कैफ़ी आज़मी
—-
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा,
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib)
—-
नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
मीर तक़ी मीर
—-
ज़ब्त अपना शेआर था, न रहा,
दिल पे कुछ इख़्तियार था, न रहा
मीर तक़ी मीर
—-
हज़ारों क़ुर्बतों पर यूँ मेरा महजूर हो जाना,
जहाँ से चाहना उनका वहीं से दूर हो जाना
~ जिगर मुरादाबादी
—-
मुहब्बत क्या है? तासीर ए मुहब्बत किसको कहते हैं,
तेरा मजबूर कर देना, मेरा मजबूर हो जाना
~ जिगर मुरादाबादी
—-
इक लफ़्ज़े मुहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिले आशिक़ फैले तो ज़माना है
~ जिगर मुरादाबादी
—-
किस लिए देखती हो आईना
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो
जौन एलिया (Jaun Elia)
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घटा देख कर ख़ुश हुईं लड़कियाँ
छतों पर खिले फूल बरसात के
मुनीर नियाज़ी (Munir Niazi)
—-
हम ऐसे ख़ाक-नशीं क्या लुभा सकेंगे उसे
वो अपना ‘अक्स भी मीज़ान-ए-ज़र में तोलता है
मोहसिन नक़वी
—-
फ़ाएदा क्या है हमें और ख़सारा क्या है
जो भी है आपका सब कुछ है हमारा क्या है
अजमल सिराज
—-
कुछ नहीं देखते कुछ भी हो तिरे दीवाने
देखते हैं तिरी जानिब से इशारा क्या है
अजमल सिराज
—-
कितना सोचा था पर इतना तो नहीं सोचा था
याद बन जाएगा वो ख़्वाब नज़र आएगा वो
अजमल सिराज
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अपनी ख़बर, न उसका पता है, ये इश्क़ है
जो था, नहीं है, और न था, है, ये इश्क़ है
इरफ़ान सत्तार
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हज़ारों काम मुहब्बत में हैं मज़े के ‘दाग़’
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं
दाग़ देहलवी
—-
‘दाग़’ की शक्ल देख कर बोले
ऐसी सूरत को प्यार कौन करे
दाग़ देहलवी
—-
इस नहीं का कोई इलाज नहीं
रोज़ कहते हैं आप आज नहीं
दाग़ देहलवी