अहमद सलमान की मशहूर शायरी और बेहतरीन शेर
अहमद सलमान आधुनिक उर्दू शायरी के महत्वपूर्ण शायरों में शामिल हैं। उनकी शायरी में समाज, राजनीति, इंसानी रिश्तों, अकेलेपन और ज़िंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों को बेहद गहरे और प्रतीकात्मक अंदाज़ में बयान किया गया है।
इस पेज पर अहमद सलमान की चुनिंदा शायरी और बेहतरीन शेर प्रस्तुत हैं, जिनमें उनकी विशिष्ट भाषा, संवेदना और सामाजिक दृष्टि दिखाई देती है।
अहमद सलमान की मशहूर शायरी
जो हम पे गुज़रे थे रंज सारे जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे
जब अपनी अपनी मुहब्बतों के अज़ाब झेले तो लोग समझे
वो जिन दरख़्तों की छाँव में से मुसाफ़िरों को उठा दिया था
उन्हीं दरख़्तों पे अगले मौसम जो फल न उतरे तो लोग समझे
उस एक कच्ची सी उम्र वाली के फ़लसफ़े को कोई न समझा
जब उस के कमरे से लाश निकली ख़ुतूत निकले तो लोग समझे
वो ख़्वाब थे ही चँबेलियों से सो सब ने हाकिम की कर ली बै’अत
फिर इक चँबेली की ओट में से जो साँप निकले तो लोग समझे
वो गाँव का इक ज़ईफ़ दहक़ाँ सड़क के बनने पे क्यूँ ख़फ़ा था
जब उनके बच्चे जो शहर जाकर कभी न लौटे तो लोग समझे
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सबने माना मरने वाला दहशत-गर्द और क़ातिल था
माँ ने फिर भी क़ब्र पे उसकी राज-दुलारा लिक्खा था
लाश के नन्हे हाथ में बस्ता और इक खट्टी गोली थी
ख़ून में डूबी इक तख़्ती पर ग़ैन-ग़ुबारा लिक्खा था
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काली रात के सहराओं में नूर-सिपारा लिक्खा था
जिस ने शहर की दीवारों पर पहला ना’रा लिक्खा था
लाश के नन्हे हाथ में बस्ता और इक खट्टी गोली थी
ख़ून में डूबी इक तख़्ती पर ग़ैन-ग़ुबारा लिक्खा था
आख़िर हम ही मुजरिम ठहरे जाने किन किन जुर्मों के
फ़र्द-ए-अमल थी जाने किस की नाम हमारा लिक्खा था
सब ने माना मरने वाला दहशत-गर्द और क़ातिल था
माँ ने फिर भी क़ब्र पे उस की राज-दुलारा लिक्खा था
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शबनम है कि धोका है कि झरना है कि तुम हो
दिल-दश्त में इक प्यास तमाशा है कि तुम हो
इक लफ़्ज़ में भटका हुआ शाइ’र है कि मैं हूँ
इक ग़ैब से आया हुआ मिस्रा है कि तुम हो
दरवाज़ा भी जैसे मिरी धड़कन से जुड़ा है
दस्तक ही बताती है पराया है कि तुम हो
इक धूप से उलझा हुआ साया है कि मैं हूँ
इक शाम के होने का भरोसा है कि तुम हो
मैं हूँ भी तो लगता है कि जैसे मैं नहीं हूँ
तुम हो भी नहीं और ये लगता है कि तुम हो
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जो दिख रहा है उसी के अंदर जो अन-दिखा है वो शा’इरी है
जो कह सका था वो कह चुका हूँ जो रह गया है वो शा’इरी है
ये शहर सारा तो रौशनी में खिला पड़ा है सो क्या लिखूँ मैं
वो दूर जंगल की झोंपड़ी में जो इक दिया है वो शा’इरी है
दिलों के माबैन गुफ़्तुगू में तमाम बातें इज़ाफ़तें हैं
तुम्हारी बातों का हर तवक़्क़ुफ़ जो बोलता है वो शा’इरी है
तमाम दरिया जो एक समुंदर में गिर रहे हैं तो क्या ‘अजब है
वो एक दरिया जो रास्ते में ही रह गया है वो शा’इरी है
अहमद सलमान