अंजुम रहबर की मशहूर शायरी और बेहतरीन ग़ज़लें

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अंजुम रहबर उर्दू शायरी की मशहूर शायराओं में शामिल हैं। उनकी शायरी में मोहब्बत, जुदाई, याद, रिश्तों और ज़िंदगी के अनुभवों को बेहद सहज और असरदार अंदाज़ में बयान किया गया है। उनके अशआर में एक तरफ़ इश्क़ और इंतज़ार की नर्मी दिखाई देती है, तो दूसरी तरफ़ ज़िंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों और रिश्तों की जटिलताओं की झलक भी मिलती है।

इस पेज पर अंजुम रहबर की चुनिंदा मशहूर शायरी और ग़ज़लें प्रस्तुत हैं। यहाँ आप उनकी मोहब्बत, जुदाई, याद और ज़िंदगी से जुड़े बेहतरीन अशआर पढ़ सकते हैं।

अंजुम रहबर की मशहूर शायरी और ग़ज़लें

आग बहते हुए पानी में लगाने आई
तेरे ख़त आज मैं दरिया में बहाने आई

फिर तिरी याद नए ख़्वाब दिखाने आई
चाँदनी झील के पानी में नहाने आई

दिन सहेली की तरह साथ रहा आँगन में
रात दुश्मन की तरह जान जलाने आई

मैं ने भी देख लिया आज उसे ग़ैर के साथ
अब कहीं जा के मिरी अक़्ल ठिकाने आई

ज़िंदगी तो किसी रहज़न की तरह थी ‘अंजुम’
मौत रहबर की तरह राह दिखाने आई

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कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं
यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं

वो बे-वफ़ा जो राह में टकरा गया कहीं
कह दूँगी मैं भी साफ़ कि पहचानती नहीं

समझाया बार-हा कि बचो प्यार-व्यार से
लेकिन कोई सहेली कहा मानती नहीं

मैंने तुझे मुआ’फ़ किया जा कहीं भी जा
मैं बुज़दिलों पे अपनी कमाँ तानती नहीं

‘अंजुम’ पे हँस रहा है तो हँसता रहे जहाँ
मैं बे-वक़ूफ़ियों का बुरा मानती नहीं

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तुमको भुला रही थी कि तुम याद आ गए
मैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद आ गए

कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में
इक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गए

उस वक़्त रात-रानी मिरे सूने सहन में
ख़ुशबू लुटा रही थी कि तुम याद आ गए

ईमान जानिए कि इसे कुफ़्र जानिए
मैं सर झुका रही थी कि तुम याद आ गए

कल शाम छत पे मीर-तक़ी-‘मीर’ की ग़ज़ल
मैं गुनगुना रही थी कि तुम याद आ गए

‘अंजुम’ तुम्हारा शहर जिधर है उसी तरफ़
इक रेल जा रही थी कि तुम याद आ गए

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मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था

मैं उस को देखने को तरसती ही रह गई
जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था

बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे
घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था

मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को
हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था

दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में
मैं जिसको चाहती थी वो लड़का ग़रीब था

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जिनके आँगन में अमीरी का शजर लगता है
उन का हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है

चाँद तारे मिरे क़दमों में बिछे जाते हैं
ये बुज़ुर्गों की दुआओं का असर लगता है

माँ मुझे देख के नाराज़ न हो जाए कहीं
सर पे आँचल नहीं होता है तो डर लगता है

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रंग इस मौसम में भरना चाहिए
सोचती हूँ प्यार करना चाहिए

ज़िंदगी को ज़िंदगी के वास्ते
रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए

दोस्ती से तजरबा ये हो गया
दुश्मनों से प्यार करना चाहिए

प्यार का इक़रार दिल में हो मगर
कोई पूछे तो मुकरना चाहिए

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