Amjad Islam Amjad Shayari
चेहरे पे मिरे ज़ुल्फ़ को फैलाओ किसी दिन
क्या रोज़ गरजते हो बरस जाओ किसी दिन
राज़ों की तरह उतरो मिरे दिल में किसी शब
दस्तक पे मिरे हाथ की खुल जाओ किसी दिन
पेड़ों की तरह हुस्न की बारिश में नहा लूँ
बादल की तरह झूम के घर आओ किसी दिन
ख़ुशबू की तरह गुज़रो मिरे दिल की गली से
फूलों की तरह मुझ पे बिखर जाओ किसी दिन
गुज़रें जो मेरे घर से तो रुक जाएँ सितारे
इस तरह मिरी रात को चमकाओ किसी दिन
मैं अपनी हर इक साँस उसी रात को दे दूँ
सर रख के मिरे सीने पे सो जाओ किसी दिन
_____________
सदियाँ जिन में ज़िंदा हों वो सच भी मरने लगते हैं
धूप आँखों तक आ जाए तो ख़्वाब बिखरने लगते हैं
इंसानों के रूप में जिस दम साए भटकें सड़कों पर
ख़्वाबों से दिल चेहरों से आईने डरने लगते हैं
क्या हो जाता है इन हँसते जीते जागते लोगों को
बैठे बैठे क्यूँ ये ख़ुद से बातें करने लगते हैं
इश्क़ की अपनी ही रस्में हैं दोस्त की ख़ातिर हाथों में
जीतने वाले पत्ते भी हों फिर भी हरने लगते हैं
देखे हुए वो सारे मंज़र नए नए दिखलाई दें
ढलती उम्र की सीढ़ी से जब लोग उतरने लगते हैं
बेदारी आसान नहीं है आँखें खुलते ही ‘अमजद’
क़दम क़दम हम सपनों के जुर्माने भरने लगते हैं
________
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा
वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं
दिल-ए-बे-ख़बर मिरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा
मैं तो गुम था तेरे ही ध्यान में तिरी आस तेरे गुमान में
सबा कह गई मिरे कान में मिरे साथ आ उसे भूल जा
किसी आँख में नहीं अश्क-ए-ग़म तिरे बअ’द कुछ भी नहीं है कम
तुझे ज़िंदगी ने भुला दिया तू भी मुस्कुरा उसे भूल जा
कहीं चाक-ए-जाँ का रफ़ू नहीं किसी आस्तीं पे लहू नहीं
कि शहीद-ए-राह-ए-मलाल का नहीं ख़ूँ-बहा उसे भूल जा
क्यूँ अटा हुआ है ग़ुबार में ग़म-ए-ज़िंदगी के फ़िशार में
वो जो दर्द था तिरे बख़्त में सो वो हो गया उसे भूल जा
तुझे चाँद बन के मिला था जो तिरे साहिलों पे खिला था जो
वो था एक दरिया विसाल का सो उतर गया उसे भूल जा
___________
ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते
जो ज़ख़्म तू ने दिए हैं भरा नहीं करते
हज़ार जाल लिए घूमती फिरे दुनिया
तिरे असीर किसी के हुआ नहीं करते
ये आइनों की तरह देख-भाल चाहते हैं
कि दिल भी टूटें तो फिर से जुड़ा नहीं करते
वफ़ा की आँच सुख़न का तपाक दो इन को
दिलों के चाक रफ़ू से सिला नहीं करते
जहाँ हो प्यार ग़लत-फ़हमियाँ भी होती हैं
सो बात बात पे यूँ दिल बुरा नहीं करते
हमें हमारी अनाएँ तबाह कर देंगी
मुकालमे का अगर सिलसिला नहीं करते
जो हम पे गुज़री है जानाँ वो तुम पे भी गुज़रे
जो दिल भी चाहे तो ऐसी दुआ नहीं करते
हर इक दुआ के मुक़द्दर में कब हुज़ूरी है
तमाम ग़ुंचे तो ‘अमजद’ खिला नहीं करते
_________
भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा
सब से छुप कर वो किसी का देखना अच्छा लगा
सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे
कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा
बात तो कुछ भी नहीं थीं लेकिन उस का एक दम
हाथ को होंटों पे रख कर रोकना अच्छा लगा
चाय में चीनी मिलाना उस घड़ी भाया बहुत
ज़ेर-ए-लब वो मुस्कुराता शुक्रिया अच्छा लगा
दिल में कितने अहद बाँधे थे भुलाने के उसे
वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा
बे-इरादा लम्स की वो सनसनी प्यारी लगी
कम तवज्जोह आँख का वो देखना अच्छा लगा
नीम-शब की ख़ामोशी में भीगती सड़कों पे कल
तेरी यादों के जिलौ में घूमना अच्छा लगा
इस अदू-ए-जाँ को ‘अमजद’ मैं बुरा कैसे कहूँ
जब भी आया सामने वो बेवफ़ा अच्छा लगा
_________
दूरियाँ सिमटने में देर कुछ तो लगती है
रंजिशों के मिटने में देर कुछ तो लगती है
हिज्र के दोराहे पर एक पल न ठहरा वो
रास्ते बदलने में देर कुछ तो लगती है
आँख से न हटना तुम आँख के झपकने तक
आँख के झपकने में देर कुछ तो लगती है
हादिसा भी होने में वक़्त कुछ तो लेता है
बख़्त के बिगड़ने में देर कुछ तो लगती है
ख़ुश्क भी न हो पाई रौशनाई हर्फ़ों की
जान-ए-मन मुकरने में देर कुछ तो लगती है
फ़र्द की नहीं है ये बात है क़बीले की
गिर के फिर सँभलने में देर कुछ तो लगती है
दर्द की कहानी को इश्क़ के फ़साने को
दास्तान बनने में देर कुछ तो लगती है
दस्तकें भी देने पर दर अगर न खुलता हो
सीढ़ियाँ उतरने में देर कुछ तो लगती है
ख़्वाहिशें परिंदों से लाख मिलती-जुलती हों
दोस्त पर निकलने में देर कुछ तो लगती है
उम्र-भर की मोहलत तो वक़्त है तआ’रुफ़ का
ज़िंदगी समझने में देर कुछ तो लगती है
रंग यूँ तो होते हैं बादलों के अंदर ही
पर धनक के बनने में देर कुछ तो लगती है
उन की और फूलों की एक सी रिदाएँ हैं
तितलियाँ पकड़ने में देर कुछ तो लगती है
ज़लज़ले की सूरत में इश्क़ वार करता है
सोचने समझने में देर कुछ तो लगती है
भीड़ वक़्त लेती है रहनुमा परखने में
कारवान बनने में देर कुछ तो लगती है
हो चमन के फूलों का या किसी परी-वश का
हुस्न के सँवरने में देर कुछ तो लगती है
मुस्तक़िल नहीं ‘अमजद’ ये धुआँ मुक़द्दर का
लकड़ियाँ सुलगने में देर कुछ तो लगती है
___________
थे ख़्वाब एक हमारे भी और तुम्हारे भी
पर अपना खेल दिखाते रहे सितारे भी
ये ज़िंदगी है यहाँ इस तरह ही होता है
सभी ने बोझ से लादे हैं कुछ उतारे भी
सवाल ये है कि आपस में हम मिलें कैसे
हमेशा साथ तो चलते हैं दो किनारे भी
किसी का अपना मोहब्बत में कुछ नहीं होता
कि मुश्तरक हैं यहाँ सूद भी ख़सारे भी
बिगाड़ पर है जो तन्क़ीद सब बजा लेकिन
तुम्हारे हिस्से के जो काम थे सँवारे भी
बड़े सुकून से डूबे थे डूबने वाले
जो साहिलों पे खड़े थे बहुत पुकारे भी
प जैसे रेल में दो अजनबी मुसाफ़िर हों
सफ़र में साथ रहे यूँ तो हम तुम्हारे भी
यही सही तिरी मर्ज़ी समझ न पाए हम
ख़ुदा गवाह कि मुबहम थे कुछ इशारे भी
यही तो एक हवाला है मेरे होने का
यही गिराती है मुझ को यही उतारे भी
इसी ज़मीन में इक दिन मुझे भी सोना है
इसी ज़मीं की अमानत हैं मेरे प्यारे भी
वो अब जो देख के पहचानते नहीं ‘अमजद’
है कल की बात ये लगते थे कुछ हमारे भी
_
Amjad Islam Amjad Shayari