राजेश रेडी के बेहतरीन शेर
दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं
____
मैंने तो ब’अद में तोड़ा था इसे
आईना मुझ पे हँसा था पहले
__
यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है
खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है
___
मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा
बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है
__
जितनी बटनी थी बट चुकी ये ज़मीं
अब तो बस आसमान बाक़ी है
___
किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यूँ नहीं होता
मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ ज़िंदा क्यूँ नहीं होता
____
मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं
ग़ाएब हुए हैं जब से तिरी दास्ताँ से हम
___
धोका है इक फ़रेब है मंज़िल का हर ख़याल
सच पूछिए तो सारा सफ़र वापसी का है
___
ग़म बिक रहे थे मेले में ख़ुशियों के नाम पर
मायूस हो के लौटे हैं हर इक दुकाँ से हम
___
किसने पाया सुकून दुनिया में
ज़िंदगानी का सामना कर के
___
क्या जाने किस जहाँ में मिलेगा हमें सुकून
नाराज़ हैं ज़मीं से ख़फ़ा आसमाँ से हम
__
दोस्तों का क्या है वो तो यूँ भी मिल जाते हैं मुफ़्त
रोज़ इक सच बोल कर दुश्मन कमाने चाहिएँ
___
कौन पढ़ता है यहाँ खोल के अब दिल की किताब
अब तो चेहरे को ही अख़बार किया जाना है
___
घर से निकले थे हौसला कर के
लौट आए ख़ुदा ख़ुदा कर के
__
दर्द-ए-दिल पाओगे वफ़ा कर के
हमने देखा है तजरबा कर के
—
ज़िंदगी तो कभी नहीं आई
मौत आई ज़रा ज़रा कर के
___
यूँ देखिए तो आँधी में बस इक शजर गया
लेकिन न जाने कितने परिंदों का घर गया
__
जैसे ग़लत पते पे चला आए कोई शख़्स
सुख ऐसे मेरे दर पे रुका और गुज़र गया
__
मैं ही सबब था अब के भी अपनी शिकस्त का
इल्ज़ाम अब की बार भी क़िस्मत के सर गया
__
दरवाज़े के अंदर इक दरवाज़ा और
छुपा हुआ है मुझ में जाने क्या क्या और