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बृहस्पतिवार का व्रत- अमृता प्रीतम Amrita Pritam Ki Kahani Vrahaspativar ka vrat ~ “बृहस्पतिवार का व्रत”  

भाग-1

आज बृहस्पतिवार था, इसलिए पूजा को आज काम पर नहीं जाना था। बच्चे के जागने की आवाज़ से पूजा जल्दी से चारपाई से उठी और उसने बच्चे को पालने में से उठाकर अपनी अलसाई-सी छाती से लगा लिया-

‘‘मन्नू देवता ! आज रोना नहीं, आज हम दोनों सारा दिन बहुत-सी बातें करेंगे…सारा दिन….’’

यह सारा दिन पूजा को हफ़्ते में एक बार नसीब होता था। इस दिन वह मन्नू को अपने हाथों से नहलाती थी, सजाती थी, खिलाती थी और उसे कन्धे पर बिठाकर आसपास के बगीचे में ले जाती थी। यह दिन आया का नहीं, माँ का दिन होता था। आज भी पूजा ने बच्चे को नहला-धुलाकर और दूध पिलाकर, जब चाबी वाले खिलौने उसके सामने रख दिए, तो बच्चे की किलकारियों से उसका रोम-रोम पुलकित हो गया। Amrita Pritam Ki Kahani Vrahaspativar ka vrat

चैत्र मास के प्रारम्भिक दिन थे। हवा में एक स्वाभाविक ख़ूशबू थी, और आज पूजा की आत्मा में भी एक स्वाभाविक ममता छलक रही थी। बच्चा खेलते-खेलते थककर उसकी टाँगों पर सिर रखकर ऊँघने लगा, तो उसे उठाकर गोदी में डालते हुए वह लोरियों जैसी बातें करने लगी- “‘मेरे मन्नू देवता को फिर नींद आ गई…मेरा नन्हा-सा देवता…बस थोड़ा-सा भोग लगाया, और फिर सो गया’’

पूजा ने ममता से विभोर होकर मन्नू का सिर भी चूम लिया, आँखें भी, गाल भी, गरदन भी—और जब उसे उठाकर चारपाई पर सुलाने लगी तो मन्नू कच्ची नींद के कारण रोने लगा। पूजा ने उसे उठाकर फिर कन्धे से लगा लिया और दुलारने लगी-

‘‘मैं कहीं नहीं जा रही, मन्नू ! आज मैं कहीं नहीं जाऊँगी…।’’

लगभग डेढ़ वर्ष के मन्नू को शायद आज भी यह अहसास हुआ था कि माँ जब बहुत बार उसके सिर व माथे को चूमती है, तो उसके बाद उसे छोड़कर चली जाती है। और कन्धे से कसकर चिपटे हुए मन्नू को वह हाथ से दुलारती हुए कहने लगी-

‘‘हर रोज तुम्हें छोड़कर चली जाती हूँ न…जानते हो कहाँ जाती हूँ ? मैं जंगल में से फूल तोड़ने नहीं जाऊँगी, तो अपने देवता की पूजा कैसे करूँगी ?’’ – और पूजा के मस्तिष्क में बिजली के समान वह दिन कौंध गया, जब एक ‘गेस्ट हाउस’ की मालकिन मैडम डी. ने उसे कहा था-

‘‘मिसेज़ नाथ ! यहाँ किसी लड़की का असली नाम किसी को नहीं बताया जाता। इसलिए तुम्हें जो भी नाम पसन्द हो रख लो।’’

और उस दिन उसके मुँह से निकला था- ‘‘मेरा नाम पूजा होगा।’’

गेस्ट हाउस वाली मैडम डी. हँस पड़ी थी- ‘‘हाँ, पूजा ठीक है, पर किस मन्दिर की पूजा ?’’

और उसने कहा था—‘‘पेट के मन्दिर की।’’

माँ के गले से लगी बाँहों ने जब बच्चे को आँखों में इत्मीनान से नींद भर दी, तो पूजा ने उसे चारपाई पर लिटाते हुए, पैरों के बल चारपाई के पास बैठकर अपना सिर उसकी छाती के निकट, चारपाई की पाटी पर रख दिया और कहने लगी-

‘‘क्या तुम जानते हो, मैंने अपने पेट को उस दिन मन्दिर क्यों कहा था ? जिस मिट्टी में से किसी देवता की मूर्ति मिल जाए, वहाँ मन्दिर बन जाता है—तू मन्नू देवता मिल गया तो मेरा पेट मन्दिर बन गया….’’

और मूर्ति को अर्ध्य देने वाले जल के समान पूजा की आँखों में पानी भर आया- ‘‘मन्नू, मैं तुम्हारे लिए फूल चुनने जंगल में जाती हूँ। बहुत बड़ा जंगल है, बहुत भयानक, चीतों से भरा हुआ, भेड़ियों से भरा हुआ, साँपों से भरा हुआ…’’ – और पूजा के शरीर का कंपन, उसकी उस हथेली में आ गया, जो मन्नू की पीठ पर पड़ी थी…और अब वह कंपन शायद हथेली में से मन्नू की पीठ में भी उतर रहा था।

उसने सोचा- “मन्नू जब खड़ा हो जाएगा, जंगल का अर्थ जान लेगा, तो माँ से बहुत नफ़रत करेगा। तब शायद उसके अवचेतन मन में से आज का दिन भी जागेगा, और उसे बताएगा कि उसकी माँ किस तरह उसे जंगल की कहानी सुनाती थी—जंगल की चीतों की, जंगल के भेड़ियों की और जंगल के साँपों की—तब शायद….उसे अपनी माँ की कुछ पहचान होगी” Amrita Pritam Ki Kahani Vrahaspativar ka vrat

पूजा ने राहत और बेचैनी की मिली-जुली साँस ली, उसे अनुभव हुआ जैसे उसने अपने पुत्र के अवचेतन मन में दर्द के एक कण को अमानत की तरह रख दिया हो। पूजा ने उठकर अपने लिए चाय का एक गिलास बनाया और कमरे में लौटते हुए कमरे की दीवारों को ऐसे देखने लगी जैसे वह उसके व उसके बेटे के चारों ओर बनी हुई किसी की बहुत प्यारी बाँहें हों…उसे उसके वर्तमान से भी छिपाकर बैठी हुई।

पूजा ने एक नज़र कमरे के उस दरवाजे की तरफ देखा—जिसके बाहर उसका वर्तमान बड़ी दूर तक फैला हुआ था…शहर के कितने ही गेस्ट हाउस, एक्सपोर्ट के कितने ही कारखाने, एअर लाइन्स के कितने ही दफ़्तर और साधारण कितने ही कमरे थे, जिनमें उसके वर्तमान का एक-एक टुकड़ा पड़ा हुआ था…परन्तु आज बृहस्पतिवार था। जिसने उसके व उसके वर्तमान के बीच में एक दरवाज़ा बन्द कर दिया था। बन्द दरवाज़े की हिफ़ाज़त  में खड़ी पूजा को पहली बार यह ख़याल आया कि उसके धन्धे में बृहस्पतिवार को छुट्टी का दिन क्यों माना गया है ? इस बृहस्पतिवार की गहराई में अवश्य कोई राज़ होगा—वह नहीं जानती थी, अतः ख़ाली-ख़ाली निगाहों से कमरे की दीवारों को देखने लगी… इन दीवारों के उस पार उसने जब भी देखा था—उसे कहीं अपना भविष्य दिखाई नहीं दिया था, केवल यह वर्तमान था…जो रेगिस्तान की तरह शहर की बहुत-सी इमारतों में फैल रहा था और पूजा यह सोचकर काँप उठी कि यही रेगिस्तान उसके दिनों से महीनों में फैलता हुआ—एक दिन महीनों से भी आगे उसके बरसों में फैल जाएगा।

और पूजा ने बन्द दरवाज़े का सहारा लेकर अपने वर्तमान से आँखें फेर लीं। उसकी नज़रें पैरों के नीचे फ़र्श  पर पड़ीं, तो बीते हुए दिनों के तहख़ाने में उतर गईं। तहख़ाने में बहुत अँधेरा था….बीती हुई ज़िन्दगी का पता नहीं क्या-क्या, कहाँ-कहाँ पड़ा हुआ था, पूजा को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। परन्तु आँखें जब अँधेरे में देखने की अभ्यस्त हुईं तो देखा—तहखाने के बाईं तरफ, दिल की ओर, एक कण-सा चमक रहा था। पूजा ने घुटनों के बल बैठकर उसे हाथ से छुआ। उसके सारे बदन में एक गरम-सी लकीर दौड़ गई और उसने पहचान लिया—यह उसके इश्क़ का ज़र्रा था, जिसमें कोई आग आज भी सलामत थी।

और इसी रोशनी में नरेन्द्र का नाम चमका—नरेन्द्रनाथ चौधरी का जिससे उसने बेपनाह मुहब्बत की थी। और साथ ही उसका अपना नाम भी चमका—गीता, गीता श्रीवास्तव।

घनी कहानी, छोटी शाखा: अमृता प्रीतम की कहानी “बृहस्पतिवार का व्रत” का दूसरा भाग
घनी कहानी, छोटी शाखा: अमृता प्रीतम की कहानी “बृहस्पतिवार का व्रत” का अंतिम भाग

क्रमशः Amrita Pritam Ki Kahani Vrahaspativar ka vrat ~ “बृहस्पतिवार का व्रत”

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