अरग़वान रब्बही

ताज़ा मुहब्बतों का नशा जिस्म-ओ-जाँ में है – परवीन शाकिर

ताज़ा मुहब्बतों का नशा जिस्म-ओ-जाँ में है फिर मौसम-ए-बहार मिरे गुल्सिताँ में है इक ख़्वाब है कि बार-ए-दिगर देखते हैं...

“मैं गंगा प्रसाद की औरत हूँ”

Main Ganga Prasaad Ki Aurat Hoon लेखक- अरग़वान रब्बही रोज़ की तरह अपने दफ़्तर की तरफ़ जाते 8 सीट वाले...

ख़्वाब ~ परवीन शाकिर

परवीन शाकिर की नज़्म - ख़्वाब खुले पानियों में घिरी लड़कियाँ नर्म लहरों के छींटे उड़ाती हुई बात-बे-बात हँसती हुई...

दकनी शायर: बीजापुर और गोलकुंडा के दरबार की शायरी

Dakni Shayari Ka Itihas ~ सन 1347 से 1527 तक दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण हिस्से पर बहमनी सल्तनत का क़ब्ज़ा...