दिल को छू लेने वाले ख़ूबसूरत शेर..
A couple gaze longingly at nature. Dressed in "Old German" clothes, according to Robert Hughes they are "scarcely different in tone or modelling from the deep dramas of nature around them"
Deep Shayari
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
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निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन,
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
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हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
मिर्ज़ा ग़ालिब
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फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं,
फिर वही ज़िंदगी हमारी है
मिर्ज़ा ग़ालिब
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बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था
हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा
शौक़ बहराइची
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वो बेदर्दी से सर काटें ‘अमीर’ और मैं कहूँ उनसे,
हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता
अमीर मीनाई
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कश्तियाँ सबकी किनारे पे पहुँच जाती हैं
नाख़ुदा जिनका नहीं उनका ख़ुदा होता है
अमीर मीनाई
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गाहे गाहे की मुलाक़ात ही अच्छी है ‘अमीर’
क़द्र खो देता है हर रोज़ का आना जाना
अमीर मीनाई
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ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम ‘अमीर’
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है
अमीर मीनाई
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अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है
हम मरे जाते हैं तुम कहते हो हाल अच्छा है
अमीर मीनाई
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साफ़ कहते हो मगर कुछ नहीं खुलता कहना
बात कहना भी तुम्हारा है मुअम्मा कहना
अमीर मीनाई
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कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई
कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए
रहमान फ़ारिस
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ख़ुशी से काँप रही थीं ये उँगलियाँ इतनी
डिलीट हो गया इक शख़्स सेव करने में
फ़हमी बदायूनी
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कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई
कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए
रहमान फ़ारिस
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चुप-चाप सुनती रहती है पहरों शब-ए-फ़िराक़
तस्वीर-ए-यार को है मिरी गुफ़्तुगू पसंद
दाग़ देहलवी
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आपका ए’तिबार कौन करे
रोज़ का इंतिज़ार कौन करे
दाग़ देहलवी
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‘दाग़’ की शक्ल देख कर बोले
ऐसी सूरत को प्यार कौन करे
दाग़ देहलवी
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बात मेरी कभी सुनी ही नहीं
जानते वो बुरी भली ही नहीं
दाग़ देहलवी
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उड़ गई यूँ वफ़ा ज़माने से
कभी गोया किसी में थी ही नहीं
दाग़ देहलवी
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‘दाग़’ क्यूँ तुमको बेवफ़ा कहता
वो शिकायत का आदमी ही नहीं
दाग़ देहलवी
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‘दाग़’ क्यूँ तुमको बेवफ़ा कहता
वो शिकायत का आदमी ही नहीं
दाग़ देहलवी
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टहलते फिर रहे हैं सारे घर में
तिरी ख़ाली जगह को भर रहे हैं
फ़हमी बदायूनी
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सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की,
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं
जाँ निसार अख़्तर
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तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो
जावेद अख़्तर
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याद उसे भी एक अधूरा अफ़्साना तो होगा
कल रस्ते में उसने हमको पहचाना तो होगा
जावेद अख़्तर
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तब हम दोनों वक़्त चुरा कर लाते थे
अब मिलते हैं जब भी फ़ुर्सत होती है
जावेद अख़्तर
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अब हवाएँ ही करेंगी रौशनी का फ़ैसला
जिस दिए में जान होगी वो दिया रह जाएगा
महशर बदायूँनी
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हमको नीचे उतार लेंगे लोग
इश्क़ लटका रहेगा पंखे से
ज़िया मज़कूर
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उसके गाँव की एक निशानी ये भी है
हर नलके का पानी मीठा होता है
ज़िया मज़कूर
Deep Shayari
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दिल तुझे पा के भी तन्हा होता
दूर तक हिज्र का साया होता
अहमद हमदानी
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जो हम पे गुज़रे थे रंज सारे जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे
जब अपनी अपनी मुहब्बतों के अज़ाब झेले तो लोग समझे
अहमद सलमान
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उस एक कच्ची सी उम्र वाली के फ़लसफ़े को कोई न समझा
जब उस के कमरे से लाश निकली ख़ुतूत निकले तो लोग समझे
अहमद सलमान
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ये शहर सारा तो रौशनी में खिला पड़ा है सो क्या लिखूँ मैं
वो दूर जंगल की झोंपड़ी में जो इक दिया है वो शाइरी है
अहमद सलमान
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है इक तमीज़ कि बाहर निकल नहीं सकता,
तुम्हारा हाथ पकड़ कर मैं चल नहीं सकता
अरग़वान
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Deep Shayari
बदल गया जो ज़माने की आज़माइश से,
मिरे अज़ीज़ ! वो दुनिया बदल नहीं सकता
अरग़वान
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लाश निकलेगी मिरे सीने से,
लेके जाएँगे जलाने वाले
अरग़वान
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यूँ जी बहल गया है तिरी याद से मगर
तेरा ख़याल तेरे बराबर न हो सका
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
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मैं अपने ख़ूँ से जलाऊँगा रहगुज़र के चराग़,
ये कहकशाँ ये सितारे मुझे क़ुबूल नहीं
शकेब जलाली
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यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है,
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
शकील बदायूँनी
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होगा किसी दीवार के साए में पड़ा ‘मीर’
क्या काम मुहब्बत से उस आराम-तलब को
मीर तक़ी मीर
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जिन जिन को था ये इश्क़ का आज़ार मर गए
अक्सर हमारे साथ के बीमार मर गए
मीर तक़ी मीर
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बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो
मीर तक़ी मीर
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यूँ उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है
मीर तक़ी मीर
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देख तो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है
मीर तक़ी मीर
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राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या
मीर तक़ी मीर
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हम हुए तुम हुए कि ‘मीर’ हुए
उसकी ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
मीर तक़ी मीर
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इश्क़ इक ‘मीर’ भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है
मीर तक़ी मीर
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बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हमको
देर से इंतिज़ार है अपना
मीर तक़ी मीर
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गुफ़्तुगू रेख़्ते में हमसे न कर
ये हमारी ज़बान है प्यारे
मीर तक़ी मीर
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मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
मीर तक़ी मीर
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‘मीर’ हम मिल के बहुत ख़ुश हुए तुमसे प्यारे
इस ख़राबे में मिरी जान तुम आबाद रहो
मीर तक़ी मीर
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दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके
पछताओगे सुनो हो ये बस्ती उजाड़ कर
मीर तक़ी मीर
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ख़ुदा करे वो पेड़ ख़ैरियत से हो
कई दिनों से उसका राब्ता नहीं
तहज़ीब हाफ़ी
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शोर करूँगा और न कुछ भी बोलूँगा
ख़ामोशी से अपना रोना रो लूँगा
तहज़ीब हाफ़ी
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मैं तेरे दुश्मन लश्कर का शहज़ादा
कैसे मुमकिन है ये शादी शहज़ादी
तहज़ीब हाफ़ी
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मैं उसको हर रोज़ बस यही एक झूठ सुनने को फ़ोन करता
सुनो यहाँ कोई मसअला है तुम्हारी आवाज़ कट रही है
तहज़ीब हाफ़ी
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मैं कि काग़ज़ की एक कश्ती हूँ
पहली बारिश ही आख़िरी है मुझे
तहज़ीब हाफ़ी
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बिखेर दे मुझे चारों तरफ़ ख़लाओं में
कुछ इस तरह से अलग कर कि जुड़ न पाऊँ मैं
मुहम्मद अल्वी
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चोरी चोरी हमसे तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
हसरत मोहानी
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,
ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है
इक़बाल
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उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़
हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा
अमीर क़ज़लबाश
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मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जाएगा
मुझे सर मार कर तेशे से मर जाना नहीं आता
यगाना चंगेज़ी
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आँसूओं में हिज्र में बरसात रखिए साल भर,
हमको गर्मी चाहिए हरगिज़ ना जाड़ा चाहिए
नासिख़
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मेरी बातों से कुछ सबक़ भी ले,
मेरी बातों का कुछ बुरा भी मान
राहत इन्दौरी
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चाहिए उसका तसव्वुर ही से नक़्शा खींचना
देख कर तस्वीर को तस्वीर फिर खींची तो क्या
बहादुर शाह “ज़फ़र”
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अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ
शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या
मुनीर नियाज़ी
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ये रौशनी तिरे कमरे में ख़ुद नहीं आई
शम्अ का जिस्म पिघलने के बाद आई है
इंदिरा वर्मा
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वो दिन कब के बीत गए जब दिल सपनों से बहलता था
घर में कोई आए कि न आए एक दिया सा जलता था
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
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हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
मिर्ज़ा ग़ालिब
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न सुनो गर बुरा कहे कोई
न कहो गर बुरा करे कोई
मिर्ज़ा ग़ालिब
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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे (बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल: बच्चों का खेल)
मिर्ज़ा ग़ालिब
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बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना
मिर्ज़ा ग़ालिब
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थक थक के हर मक़ाम पे दो चार रह गए,
तेरा पता न पाएँ तो नाचार क्या करें
मिर्ज़ा ग़ालिब
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ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान ‘ग़ालिब’,
तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता
मिर्ज़ा ग़ालिब
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रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
मिर्ज़ा ग़ालिब
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इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
मिर्ज़ा ग़ालिब
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Deep Shayari