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Ghalib ka khat .. मिर्ज़ा ग़ालिब परवीन शाकिर Urdu Shayari Shabd Ghalib Shayari Parveen Shakir Shayari Top Urdu Shayari Ghalib Ke Khat Ghalib Ke Baare MeinGhalib

Ghalib Ke Baare Mein ~ मशहूर शा’इर मिर्ज़ा ग़ालिब का आज 220वाँ जन्मदिन है. उर्दू और फ़ारसी के मशहूर शा’इर मिर्ज़ा असद उल्लाह बेग़ ख़ान का जन्म 27 दिसम्बर, 1797 को हुआ था. उन्होंने कुछ वक़्त “असद” तख़ल्लुस में शा’इरी की लेकिन बाद में उन्होंने “ग़ालिब” तख़ल्लुस का इस्तेमाल किया. आज के दौर में भी अगर देखा जाए तो उनसे ज़्यादा मक़बूल कोई दूसरा शा’इर नहीं है. अगर किसी का शा’इरी से थोड़ा भी राबता है तो उसके यहाँ ग़ालिब का दीवान मिलना लगभग तय है.

ग़ालिब के जन्मदिन के मौक़े पर हमने इंदौर के रहने वाले ज़ीशान मीर से बात की. अदब की समझ रखने वाले ज़ीशान कहते हैं कि उर्दू शा’इरी में जो ग़ालिब का कॉन्ट्रिब्यूशन उससे तो सभी वाकिफ़ हैं लेकिन उनकी शा’इरी के इलावा एक बात ये भी समझने वाली है कि ग़ालिब की शा’इरी सिर्फ़ जज़्बात का बयान या सिर्फ़ तग़ज़्ज़ुल ही नहीं है बल्कि अपने जज़्बात को किस तरह से दुनिया के फ़लसफ़े से जोड़ना है, ये भी है.

ज़ीशान के मुताबिक़ ग़ालिब के यहाँ फ़लसफ़ा है और जितने बड़े वो शा’इर थे उतने ही आला दर्जे के फ़लसफ़ी भी थे. वो कहते हैं कि हालाँकि हम अक्सर वेस्टर्न फ़िलास्फ़र को ज़्यादा तवज्जो देते हैं लेकिन ग़ालिब शायद उनकी तुलना में भी बहुत मज़बूत हैं. जीशान कहते हैं,”मैं उन्हें एरिस्टोटल, सोक्रेटस, और प्लेटो के बराबर मानता हूँ..आप ये शे’र देखिये.. ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान ‘ग़ालिब’/तुझे हम वली समझते जो ना बादा-ख़्वार होता…या.. बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे/ होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

हालाँकि ज़ीशान ये भी कहते हैं कि आजकल के दौर में ग़ालिब का नाम लेना फैशन सा हो गया है और उन्हें समझने की कोशिश कम ही लोग करते हैं. वो कहते हैं कि ग़ालिब के यहाँ जो हाज़िर जवाबी है वो उर्दू शा’इरी में कहीं और नहीं मिलती. हाज़िर जवाबी की बात करते हुए ज़ीशान ने हमें ग़ालिब का एक क़िस्सा भी सुनाया. उन्होंने बताया,“एक बार आम-नोशी के दौरान जब ग़ालिब ने अपने एक दोस्त हकीम साहब को जब कहा कि “अमा लीजिये ना” तो हकीम साहब ने कहा “नहीं, मैं आम नहीं खाता”, इस पर ग़ालिब चौंक से गए और उन्होंने कहा “आप ऐसे पहले शख़्स हैं जिन्हे मैं आम के लिए इंकार करते देख रहा हूँ”, इस पर हकीम साहब मुस्कुराने लगे. इत्तिफ़ाक़ ये हुआ कि उसी वक़्त कुछ गधे वहाँ से गुज़र रहे थे, इस पर किसी ने आम गधे की तरफ़ फेंक दिए लेकिन गधे ने आम सूंघे सिर्फ़, खाए नहीं. ये देख हकीम साहब ने ग़ालिब से कहा “लीजिये साहिबान आम तो गधे तक नहीं खाए.. लेकिन आप लोग खाते हैं” ऐसा कहकर वो मुस्कुराने लगे. ग़ालिब ने आम की गुठली चूसते हुआ कहा-“जी, सही फ़रमाया आपने, गधे आम नहीं खाते”.

पाठकों के लिए ग़ालिब की एक ग़ज़ल

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

इक खेल है औरंग-ए-सुलेमाँ मेरे नज़दीक,
इक बात है एजाज़-ए-मसीहा मिरे आगे

जुज़ नाम नहीं सूरत-ए-आलम मुझे मंज़ूर,
जुज़ वहम नहीं हस्ती-ए-अशिया मिरे आगे

होता है निहाँ गर्द में सहरा मिरे होते,
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मिरे आगे

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तिरे पीछे,
तू देख कि क्या रंग है तेरा मिरे आगे

सच कहते हो ख़ुद-बीन ओ ख़ुद-आरा हूँ ना क्यूँ हूँ,
बैठा है बुत-ए-आइना-सीमा मिरे आगे

नफ़रत का गुमाँ गुज़रे है मैं रश्क से गुज़रा,
क्यूँकर कहूँ लो नाम न उन का मिरे आगे

ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र,
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे

आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम,
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मेरे आगे

ख़ुश होते हैं पर वस्ल में यूँ मर नहीं जाते,
आई शब-ए-हिज्राँ की तमन्ना मिरे आगे

है मौजज़न इक क़ुल्ज़ुम-ए-ख़ूँ काश यही हो,
आता है अभी देखिए क्या क्या मिरे आगे

हम-पेशा ओ हम-मशरब ओ हमराज़ है मेरा,
‘ग़ालिब’ को बुरा क्यूँ कहो अच्छा मिरे आगे

~ Ghalib Ke Baare Mein

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