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Urdu Poetry Words आज हम कुछ ऐसे ज़रूरी अलफ़ाज़ के बारे में आपसे बात करने जा रहे हैं जो आम बोलचाल में अक्सर ग़लत ही तरह से बोले जाते हैं.

तज’रबा या तज’रिबा (تجربہ): तज’रबा का अर्थ है अनुभव. इस लफ़्ज़ को अक्सर करके लोग ‘तजुर्बा’ पढ़ते हैं जबकि ये सही नहीं है, सही लफ़्ज़ तजरबा है. इसमें पहले तज और फिर रबा पढ़ा जाएगा. शा’इरी में वज़्न करते वक़्त इस बात का विशेष ध्यान रखना होता है. नीचे दो शे’र दिए जा रहे हैं, इनकी तक़ती’अ करके देखा जा सकता है.

साहिर लुधियानवी का शे’र देखिये-
“दुनिया ने तज’रबात ओ हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं”

हस्तीमल हस्ती का शे’र देखिये-
ये तज’रबा हुआ है मुहब्बत की राह में
खो कर मिला जो हम को वो पा कर नहीं मिला

जम्’अ(جمع) : इस शब्द का अर्थ है “एकत्रित होना”. ज़्यादातर लोग इसे ‘जमा’ पढ़ते हैं जबकि सही लफ़्ज़ जम्’अ है. उर्दू शा’इरी में इसका वज़्न 21 होगा जबकि अगर जमा पढ़ा जाता तो ये 12 होता. इसलिए इसका विशेष ध्यान देना है.

फ़रहत एहसास का शे’र देखिये-
“हम जम्अ’ हुए ही जा रहे थे
आराम मिला जो घट के देखा”

शुरू’अ (شروع) – शुरू’अ का अर्थ है “प्रारम्भ करना”. इस शब्द को अक्सर लोग ‘शुरू’ बोलते हैं जबकि सही तरीक़ा शुरू’अ है. ऐसा होने की वजह से इसका वज़्न 121(शु=1,रू=2,अ=1) होगा वहीँ अगर शुरू बोलेंगे तो वज़्न 22 होता (शु-2,रू-2)

क़ाएम चाँदपुरी का शे’र देखिये-
“शब मैं चाहा करूँ कुछ उस से सवाल,
बिन सुने ही किया जवाब शुरूअ”

नोट: मन’अ, दफ़’अ, नफ़’अ भी जम’अ की तरह से ही बोले जाते हैं जबकि लोग इन्हें मना, दफ़ा और नफ़ा बोलते हैं. इनके बारे में आगे चर्चा करेंगे. Urdu Poetry Words

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