अपनी शायरी में इन शब्दों का बार-बार इस्तेमाल करते हैं तहज़ीब हाफ़ी…

तहज़ीब हाफ़ी (Tehzeeb Hafi Romantic Poetry) उर्दू शाइरी में एक ऐसा नाम हैं जो किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. अपनी रूमानियत में डूबी जज़्बाती शाइरी से उन्होंने आम लोगों के दिलों में जगह बनाई है. तहज़ीब हाफ़ी नए दौर के अलफ़ाज़ अपनी शाइरी में ख़ूब इस्तेमाल करते हैं लेकिन साथ ही वो अपनी शाइरी में वातावरण को ख़ूब तरजीह देते हैं. उन्होंने अपनी शाइरी में पेड़, पौधे, परिंदे, बारिश और ठण्ड जैसे शब्दों का ख़ूब इस्तेमाल किया है. हम इस पोस्ट में तहज़ीब के इसी विषय से सम्बंधित शेर यहाँ शेयर कर रहे हैं.

तहज़ीब हाफ़ी के बेहतरीन शेर
तहज़ीब हाफ़ी की ग़ज़लें..
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कौन हमारी प्यास पे डाका डाल गया
किस ने मश्कीज़ों के तस्मे खोले हैं

तहज़ीब हाफ़ी

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राहगीरों ने रह बदलनी है
पेड़ अपनी जगह खड़े रहे हैं

तहज़ीब हाफ़ी

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ख़ुदा करे वो पेड़ ख़ैरियत से हो
कई दिनों से उसका राब्ता नहीं

तहज़ीब हाफ़ी

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न जाने कितने परिंदों ने इसमें शिरकत की
कल एक पेड़ की तक़रीब-ए-रू-नुमाई थी

तहज़ीब हाफ़ी

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मुद्दत से मेरी आँख में इक ख़्वाब है मुक़ीम
पानी में पेड़ पेड़ की छाँव में रेत है

तहज़ीब हाफ़ी
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यूँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ
जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया

तहज़ीब हाफ़ी

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एक फलदार पेड़ हूँ लेकिन
वक़्त आने पे बे-समर भी हूँ

तहज़ीब हाफ़ी
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वो जिसकी छाँव में पच्चीस साल गुज़रे हैं
वो पेड़ मुझसे कोई बात क्यूँ नहीं करता

तहज़ीब हाफ़ी
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पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थे
मैं जंगल में पानी लाया करता था

तहज़ीब हाफ़ी

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मैं कि काग़ज़ की एक कश्ती हूँ
पहली बारिश ही आख़िरी है मुझे

तहज़ीब हाफ़ी

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मिरे हाथों से लग कर फूल मिट्टी हो रहे हैं
मिरी आँखों से दरिया देखना सहरा लगेगा

तहज़ीब हाफ़ी
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बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता
हमारे गाँव में बरसात क्यूँ नहीं करता

तहज़ीब हाफ़ी
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अपनी मस्ती में बहता दरिया हूँ
मैं किनारा भी हूँ भँवर भी हूँ

तहज़ीब हाफ़ी
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मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर
ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है

तहज़ीब हाफ़ी
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इस लिए रौशनी में ठंडक है
कुछ चराग़ों को नम किया गया है

तहज़ीब हाफ़ी
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सहरा से हो के बाग़ में आया हूँ सैर को
हाथों में फूल हैं मिरे पाँव में रेत है

तहज़ीब हाफ़ी
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कोई कमरे में आग तापता हो
कोई बारिश में भीगता रह जाए

तहज़ीब हाफ़ी
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Tehzeeb Hafi Romantic Poetry

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