फ़हमीदा रियाज़ की ज़िन्दगी और शायरी
Fahmida Riaz Biography फ़हमीदा रियाज़ उर्दू साहित्य की एक प्रमुख कवयित्री, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता थीं। उनका जन्म 28 जुलाई सन 1946 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ, विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान के हैदराबाद (सिंध) में बस गया। उन्होंने अपनी शिक्षा हैदराबाद और कराची में पूरी की और उर्दू, फारसी, तथा अंग्रेज़ी साहित्य में गहरी रुचि विकसित की।
फ़हमीदा ने उर्दू साहित्य को एक नई दिशा दी। उनकी पहली काव्य संग्रह “पत्थर की ज़ुबान” 1967 में प्रकाशित हुई। उनकी रचनाओं में विद्रोह, सामाजिक असमानता, और महिलाओं के अधिकारों की स्पष्ट झलक मिलती है। उनकी प्रसिद्ध कृतियां, जैसे “बदन दरीदा,” महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों के प्रति एक बेबाक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। उनके विचार और लेखन परंपरागत साहित्यकारों के लिए विवादास्पद रहे, लेकिन उनकी शैली ने उर्दू साहित्य में एक नई ऊर्जा का संचार किया।
फ़हमीदा सिर्फ एक साहित्यकार नहीं थीं; वे एक प्रखर सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं। उन्होंने महिलाओं और मानवाधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष किया। 1980 के दशक में, पाकिस्तान में ज़िया-उल-हक़ की तानाशाही के दौरान, उन्होंने सरकार की कट्टरपंथी नीतियों की मुखर आलोचना की। इसके परिणामस्वरूप, उन्हें पाकिस्तान छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी, जहाँ उन्होंने भारतीय साहित्यकारों के साथ सामाजिक और साहित्यिक आंदोलनों में भाग लिया।
फ़हमीदा रियाज़ का जीवन व्यक्तिगत और राजनीतिक संघर्षों से भरा था, लेकिन उनके विचार और लेखन कभी नहीं रुके। उन्होंने अपनी कविताओं और लेखों के माध्यम से समाज के हर वर्ग के लिए समानता और न्याय की मांग की। फ़हमीदा जब पाकिस्तान लौटीं तो उनका ज़ोरदार इस्तक़बाल हुआ।
21 नवंबर 2018 को पाकिस्तान के शहर लाहौर में उनका निधन हो गया। उनके जाने के बाद भी उनकी रचनाएं और विचार एक प्रेरणा के रूप में जीवित हैं। फ़हमीदा रियाज़ का जीवन और लेखन सत्य और स्वतंत्रता के प्रति समर्पण का प्रतीक है, जो उर्दू साहित्य और समाज में हमेशा जीवंत रहेगा।
— फ़हमीदा का एक मशहूर शेर —
“चलते चलते कुछ थम जाना फिर बोझल क़दमों से चलना
ये कैसी कसक सी बाक़ी है जब पाँव में वो काँटा भी नहीं”
——
— फ़हमीदा की एक मशहूर नज़्म —
उसको इक दिन तो जाना था
मुझसे क्या रिश्ता क्या नाता
बस पल-दो-पल को ठहरा था
पल-दो-पल हँसते गुज़रा था
मैं तब भी सोचा करती थी
ये साथ बड़ा लम्हाती है
जज़्बे की थोड़ी सी गर्मी
जलते छाले बन जाती है
इस बात को बीते साल हुए
फिर दुनिया है पहले जैसी
सब रंग वही रानाई वही
सब हुस्न वही पर क्या कीजे
सच्चे थे मिरे सब अंदेशे
अब भी यूँ ही बैठे-बैठे
याद आए तो दिल दुख जाता है
Fahmida Riaz Biography