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Delhi Shayari Delhi

दिल्ली ( Delhi Shayari ) एक ऐसा शहर है जो सालों से हिन्दुस्तान की राजधानी बना हुआ है. अंग्रेज़ों के दौर में दिल्ली के हाथ से ये तमगा कुछ दिनों के लिए छिन गया था लेकिन दिल्ली ने आख़िर वो मक़ाम हासिल ही कर लिया. दिल्ली उर्दू तहज़ीब ओ रवायत का मरकज़ रहा है. आज भी पुरानी दिल्ली की गलियाँ शेर ओ शायरी की रवायत को लेकर चलती हैं. नए पुराने हर दौर के शाइरों ने दिल्ली को लेकर अच्छे शेर कहे हैं. कुछ शेर हम यहाँ पेश कर रहे हैं, मुलाहिज़ा फ़रमायें…

दिल-लगी के वास्ते देहली में है मटिया-महल
कौन जावे ख़ाक उड़ाने मुल्क-ए-बीकानेर को

किशन लाल तालिब देहलवी

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ऐ वाए इंक़लाब ज़माने के जौर से
दिल्ली ‘ज़फ़र’ के हाथ से पल में निकल गई

बहादुर शाह ज़फ़र

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दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
जो भी गुज़रा है उसने लूटा है

बशीर बद्र

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इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्रे सुख़न,
कौन जाए ज़ौक़ पर दिल्ली की गलियाँ छोड़कर

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
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दिल्ली पे रोना आता है करता हूँ जब निगाह
मैं उस कुहन ख़राबे की तामीर की तरफ़

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का

मीर तक़ी मीर

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दिल्ली के न थे कूचे औराक़-ए-मुसव्वर थे
जो शक्ल नज़र आई तस्वीर नज़र आई

मीर तक़ी मीर

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अमीर-ज़ादों से दिल्ली के मिल न ता-मक़्दूर
कि हम फ़क़ीर हुए हैं इन्हीं की दौलत से

मीर तक़ी मीर
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मरसिए दिल के कई कह के दिए लोगों को
शहर-ए-दिल्ली में है सब पास निशानी उस की

मीर तक़ी मीर

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चेहरे पे सारे शहर के गर्द-ए-मलाल है
जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

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तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़

अल्ताफ़ हुसैन हाली

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दिल्ली कहाँ गईं तिरे कूचों की रौनक़ें
गलियों से सर झुका के गुज़रने लगा हूँ मैं

जाँ निसार अख़्तर

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जनाब-ए-‘कैफ़’ ये दिल्ली है ‘मीर’ ओ ‘ग़ालिब’ की
यहाँ किसी की तरफ़-दारियाँ नहीं चलतीं

कैफ़ भोपाली

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दिल्ली में अपना था जो कुछ अस्बाब रह गया
इक दिल को ले के आए हैं उस सरज़मीं से हम

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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दिल्ली हुई है वीराँ सूने खंडर पड़े हैं
वीरान हैं मोहल्ले सुनसान घर पड़े हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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ऐ सबा मैं भी था आशुफ़्ता-सरों में यकता
पूछना दिल्ली की गलियों से मिरा नाम कभी

हसन नईम

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क्यूँ मता-ए-दिल के लुट जाने का कोई ग़म करे
शहर-ए-दिल्ली में तो ऐसे वाक़िए होते रहे

ज़ुबैर रिज़वी
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अर्ज़-ए-दकन में जान तो दिल्ली में दिल बनी
और शहर-ए-लखनऊ में हिना बन गई ग़ज़ल

गणेश बिहारी तर्ज़

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Delhi Shayari

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