किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी ‘इन्दुमती’: पहला भाग
किशोरीलाल गोस्वामी की ‘इन्दुमती’ (1900) हिंदी कहानी के आरंभिक इतिहास की महत्वपूर्ण रचनाओं में गिनी जाती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे हिंदी की पहली मौलिक कहानी माना था, हालांकि हिंदी की पहली कहानी को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं। साहित्य दुनिया पर यह कहानी चार भागों में प्रस्तुत की गई है।
किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी इन्दुमती
भाग-1
इन्दुमती अपने बूढ़े पिता के साथ विन्ध्याचल के घने जंगल में रहती थी। जब से उसके पिता वहाँ पर कुटी बनाकर रहने लगे, तब से वह बराबर उन्हीं के साथ रही; न जंगल के बाहर निकली, न किसी दूसरे का मुँह देख सकी। उसकी अवस्था चार-पाँच वर्ष की थी जबकि उसकी माता का परलोकवास हुआ और तब उसके पिता उसे लेकर वनवासी हुए। जब से वह समझने योग्य हुई तब से नाना प्रकार के वनैले पशु-पक्षियों, वृक्षावलियों और गंगा की धारा के अतिरिक्त यह नहीं जानती थी कि संसार व संसारी सुख क्या है और उसमें कैसे-कैसे विचित्र पदार्थ भरे पड़े हैं। फूलों को बिन-बिन कर माला बनाना, हरिणों के संग कलोल करना, दिन-भर वन-वन घूमना और पक्षियों का गाना सुनना; बस यही उसका काम था। वह यह भी नहीं जानती थी कि मेरे बूढ़े पिता के अतिरिक्त और भी कोई मनुष्य संसार में है।
एक दिन वह नदी में अपनी परछाईं देखकर बड़ी मोहित हुई, पर जब उसने जाना कि यह मेरी परछाईं है, तब बहुत लज्जित हुई, यहाँ तक कि उस दिन से फिर कभी उसने नदी में अपना मुख नहीं निहारा।
गरमी की ऋतु..दोपहर का समय- जबकि उसके पिता अपनी कुटी में बैठे हुए गीता की पुस्तक देख रहे थे, वह नदी किनारे पेड़ों की ठण्डी छाया में घूमती, फूलों को तोड़-तोड़ नदी में बहाती हुई कुछ दूर निकल गई थी, कि एकाएक चौंककर खड़ी हुई। उसने एक ऐसी वस्तु देखी, जिसका उसे स्वप्न में भी ध्यान न था और जिसके देखने से उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा। उसने क्या देखा कि एक बहुत ही सुंदर बीस-बाईस वर्ष का युवक नदी के किनारे पेड़ की छाया में घास पर पड़ा सो रहा है।
इन्दुमती ने आज तक बूढ़े पिता को छोड़ किसी दूसरे मनुष्य की सूरत तक नहीं देखी थी। वह अभी तक यही सोचे हुई थी कि यदि संसार में और भी मनुष्य होंगे तो वे भी मेरे पिता की भाँति ही होंगे और उनकी भी दाढ़ी-मूँछें पकी हुई होंगी। उसने जब अच्छी तरह आँखें फाड़-फाड़कर उस परम सुंदर युवक को देखा तो अपने मन में निश्चय किया कि “मनुष्य तो ऐसा होता नहीं, हो-न-हो यह कोई देवता होंगे क्योंकि मेरे पिता जब देवताओं की कहानी सुनाते हैं तो उनके ऐसे ही रूप-रंग बतलाते हैं”- यह सोचकर वह मन में कुछ डरी और कुछ दूर पेड़ की ओट में खड़ी हो टकटकी बाँध उस युवक को देखने लगी। मारे डर के युवक के पास तक न गयी और उसकी सुंदरता से मोहित हो कुटी की ओर भी अपना पैर न बढ़ा सकी। यों ही घण्टों बीत गए, पर इन्दुमती को न जान पड़ा कि मैं कितनी देर से खड़ी-खड़ी इसे निहार रही हूँ। बहुत देर पीछे वह अपना जी कड़ा करके वृक्ष की ओट से निकल युवक के आगे बढ़ी। दो ही चार डग चली होगी कि एकाएक युवक की नींद खुल गयी और उसने अपने सामने एक परम सुंदरी देवी-मूर्ति को देखा, जिसके देखने से उसके आश्चर्य की सीमा न रही।
मन-ही-मन सोचने लगा – “इस भयानक घनघोर जंगल में ऐसी मनमोहिनी परम सुंदरी स्त्री कहाँ से आयी? ऐसा रूप-रंग तो बड़े-बड़े राजाओं के रनिवास में भी दुर्लभ है, सो इस वन में कहाँ से आया? या तो मैं स्वप्न में स्वर्ग की सैर करता होऊँगा, या किसी देवकन्या या वनदेवी ने मुझे छलने के लिए दर्शन दिया होगा”- यही सब सोच-विचार करता हुआ वह भी पड़ा-पड़ा इन्दुमती की ओर निहारने लगा। दोनों की रह-रहकर आँखें चार हो जातीं, जिससे अचरज के अतिरिक्त और कोई भाव नहीं झलकता था। यों ही परस्पर देखाभाली होते-होते एकाएक इन्दुमती के मन में किसी अपूर्व भाव का उदय हो आया, जिससे वह इतनी लज्जित हुई कि उसकी आँखें नीची और मुख लाल हो गया। वह भागना चाहती थी। चट युवक उठकर उसके सामने खड़ा हो गया और कहने लगा-
“हे सुंदरी, तुम देवकन्या हो या वनदेवी हो? चाहे कोई हो, पर कृपा कर तुमने दर्शन दिया है तो ज़रा-सी दया करो, ठहरो, मेरी बातें सुनो, घबराओ मत। यदि तुम मनुष्य की लड़की हो तो डरो मत, सुनो, यदि तुम सचमुच वन देवी हो तो कृपा कर मुझे इस वन से निकलने का सीधा मार्ग बता दो। मैं विपत्ति का मारा तीन दिन से इस वन में भटक रहा हूँ, पर निकलने का मार्ग नहीं पाता। और जो तुम मेरी ही भाँति मनुष्य जाति की हो तो मैं तुम्हारा ‘अतिथि हूँ’, मुझे केवल आज भर के लिए टिकने की जगह दो। और अधिक मैं कुछ नहीं चाहता”
युवक की बातें सुनकर इन्दुमती ने मन में सोचा कि- “तो क्या ये देवता नहीं है? हम लोगों ही की भाँति मनुष्य है? हो सकता है, क्योंकि जो ये देवता होते तो ऐसी मीठी-मीठी बातें बनाकर अतिथि क्यों बनते। देवताओं को कमी किस बात की है, और वे क्या नहीं जानते जो हमसे वन का मार्ग पूछते। तो यह मनुष्य ही होंगे, पर क्या मनुष्य इतने सुंदर होते और ऐसी मीठी बातें करते हैं? अहा! एक दिन मैं जल में अपनी सुंदरता देखकर ऐसी मोहित हुई थी, किंतु इनकी सुंदरता के आगे तो मेरा रूप-रंग निरा पानी है”- इस तरह सोचते-विचारते उसने अपना सिर ऊँचा किया और देखा कि युवक अपनी बात का उत्तर पाने के लिए सामने एकटक लगा खड़ा है। यह देख वह बहुत ही अधीनताई और मधुर स्वर से बोली कि –
“मैं अपने बूढ़े पिता के साथ इस घने जंगल के भीतर एक छोटी-सी कुटी में, जो एक सुहावनी पहाड़ी की चोटी पर बनी हुई है, रहती हूँ। यदि तुम मेरे अतिथि होना चाहते हो तो मेरी कुटी पर चलो, जो कुछ मुझसे बनेगा, कंदमूल, फल-फूल और जल से तुम्हारी सेवा करूँगी। मेरे पिता भी तुम्हें देखकर बहुत प्रसन्न होंगे”- इतना कहकर वह युवक को अपने साथ ले पहाड़ी पगडण्डी से होती हुई अपनी कुटी की ओर बढ़ी।
उसने जो युवक से कहा था कि- “मेरे पिता भी तुम्हें देखकर बहुत प्रसन्न होंगे”- सो केवल अपने स्वभाव के अनुसार ही कहा था, क्योंकि वह यही जानती थी कि ऐसी सुंदर मूर्ति को देख मेरे पिता भी मेरी भाँति आनंदित होंगे, परंतु कुटी के पास पहुँचते ही उसका सब सोचा-विचारा हवा हो गया, उसके सुख का सपना जाता रहा और वह जिस बात को ध्यान में भी नहीं ला सकती थी वही आगे आयी। अर्थात वह बुड्ढ़ा अपनी लड़की को पराये पुरुष के साथ आती हुई देखकर, मारे क्रोध के आग हो गया और अपनी कुटी से निकल युवक के आगे खड़ा हो यों कहने लगा-
“अरे दुष्ट! तू कौन है? क्या तुझे अपने प्राणों का मोह नहीं है जो तू बेधड़क मेरी कन्या से बोला और मेरी कुटी पर चला आया? तू जानता नहीं कि जो मनुष्य मेरी आज्ञा के बिना इस वन में पैर रखता है उसका सिर काटा जाता है? अच्छा, ठहर, अब तुझे भी प्राणदण्ड दिया जाएगा”
इतना कह वह क्रोध से युवक की ओर घूरने लगा। बिचारी इन्दुमती की विचित्र दशा थी, उसने आज तक अपने पिता की ऐसी भयानक मूर्ति नहीं देखी थी।
क्रमशः
घनी कहानी छोटी शाखा: किशोरीलाल गोस्वामी की लिखी कहानी “इन्दुमती” का दूसरा भाग
घनी कहानी छोटी शाखा: किशोरीलाल गोस्वामी की लिखी कहानी “इन्दुमती” का तीसरा भाग
घनी कहानी छोटी शाखा: किशोरीलाल गोस्वामी की लिखी कहानी “इन्दुमती” का अंतिम भाग