दो शा’इर, दो नज़्में (2): मख़दूम और फै़ज़…
Sahitya Duniya
Makhdoom Aur Faiz Ki Nazm
मख़दूम मुहिउद्दीन की नज़्म: “चारागर”
इक चमेली के मंडवे-तले
मय-कदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर
दो बदन
प्यार की आग में जल गए
प्यार हर्फ़-ए-वफ़ा प्यार उन का ख़ुदा
प्यार उन की चिता
दो बदन
ओस में भीगते चाँदनी में नहाते हुए
जैसे दो ताज़ा-रौ ताज़ा-दम फूल पिछले-पहर
ठंडी ठंडी सुबुक-रौ चमन की हवा
सर्फ़-ए-मातम हुई
काली काली लटों से लपट गर्म रुख़्सार पर
एक पल के लिए रुक गई
हम ने देखा उन्हें
दिन में और रात में
नूर-ओ-ज़ुल्मात में
मस्जिदों के मनारों ने देखा उन्हें
मंदिरों के किवाड़ों ने देखा उन्हें
मय-कदों की दराड़ों ने देखा उन्हें
अज़-अज़ल ता-अबद
ये बता चारा-गर
तेरी ज़म्बील में
नुस्ख़ा-ए-कीमीया-ए-मुहब्बत भी है
कुछ इलाज ओ मुदावा-ए-उल्फ़त भी है
इक चमेली के मंडवे-तले
मय-कदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर
दो बदन
……….. Makhdoom Aur Faiz Ki Nazm
फै़ज़ अहमद फै़ज़ की नज़्म: तन्हाई
फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं,
राह-रौ होगा कहीं और चला जाएगा
ढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबार
लड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़
सो गई रास्ता तक तक के हर इक राहगुज़ार
अजनबी ख़ाक ने धुँदला दिए क़दमों के सुराग़
गुल करो शमएँ बढ़ा दो मय ओ मीना ओ अयाग़
अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लो
अब यहाँ कोई नहीं कोई नहीं आएगा
फ़ोटो क्रेडिट (फ़ीचर्ड इमेज): प्रियंका शर्मा