ज़ुल्फ़ पर बेहतरीन शेर..

Zulf Shayari

अपने सर इक बला तो लेनी थी
मैं ने वो ज़ुल्फ़ अपने सर ली है

जौन एलिया
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पा-ब-ज़ंजीर ज़ुल्फ़-ए-यार रही
दिल असीर-ए-ख़याल-ए-यार रहा

रसा चुग़ताई
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तसव्वुर ज़ुल्फ़ का है और मैं हूँ
बला का सामना है और मैं हूँ

लाला माधव राम जौहर
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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

मिर्ज़ा ग़ालिब

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हो रहा है जहान में अंधेर
ज़ुल्फ़ की फिर सिरिश्ता-दारी है

मिर्ज़ा ग़ालिब

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जब उस की ज़ुल्फ़ में पहला सफ़ेद बाल आया
तब उस को पहली मुलाक़ात का ख़याल आया

शहज़ाद अहमद

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न झटको ज़ुल्फ़ से पानी ये मोती टूट जाएँगे
तुम्हारा कुछ न बिगड़ेगा मगर दिल टूट जाएँगे

राजेन्द्र कृष्ण

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किसी की ज़ुल्फ़ के सौदे में रात की है बसर
किसी के रुख़ के तसव्वुर में दिन तमाम किया

पीर शेर मोहम्मद आजिज़

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बिखरी हुई वो ज़ुल्फ़ इशारों में कह गई
मैं भी शरीक हूँ तिरे हाल-ए-तबाह में

जलील मानिकपूरी
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तिरी आरज़ू तिरी जुस्तुजू में भटक रहा था गली गली
मिरी दास्ताँ तिरी ज़ुल्फ़ है जो बिखर बिखर के सँवर गई

बशीर बद्र

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कई चाँद थे सर-ए-आसमाँ कि चमक चमक के पलट गए
न लहू मिरे ही जिगर में था न तुम्हारी ज़ुल्फ़ सियाह थी

अहमद मुश्ताक़

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जो देखते तिरी ज़ंजीर-ए-ज़ुल्फ़ का आलम
असीर होने की आज़ाद आरज़ू करते

हैदर अली आतिश

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कुछ देर किसी ज़ुल्फ़ के साए में ठहर जाएँ
‘क़ाबिल’ ग़म-ए-दौराँ की अभी धूप कड़ी है

क़ाबिल अजमेरी

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उलझा है पाँव यार का ज़ुल्फ़-ए-दराज़ में
लो आप अपने दाम में सय्याद आ गया

मोमिन ख़ाँ मोमिन

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मेरे जुनूँ को ज़ुल्फ़ के साए से दूर रख
रस्ते में छाँव पा के मुसाफ़िर ठहर न जाए

फ़ानी बदायुनी
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तुम्हारी ज़ुल्फ़ को होंठों से छू के देखूँगा,
तुम्हारे जिस्म को हाथों से थामना है मुझे

अरग़वान रब्बही
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रंग पैराहन का ख़ुशबू ज़ुल्फ़ लहराने का नाम
मौसम-ए-गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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जब ज़ुल्फ़ की कालक में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता

मीना कुमारी नाज़

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क्या हमारा नहीं रहा सावन
ज़ुल्फ़ याँ भी कोई घटा भेजो

जौन एलिया

Zulf Shayari

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