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Breakup shayari Ab Aur Kya Kisi Se Marasim Badhayen Hum Koo Ba Koo Phail Gayi Baat Shanasayi Ki Rehman Faris Shayari Zulf ShayariBreakup shayari

जाँ निसार अख़्तर की ग़ज़ल: अशआ’र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं (Ashaar mere yoon to zamane ke liye hain)

अशआ’र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं,
कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं

आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं

देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
[रदीफ़- के लिए हैं]
[क़ाफ़िए- ज़माने, सुनाने, लगाने, बुझाने, सजाने, जलाने, भुलाने]
Ashaar mere yoon to zamane ke liye hain
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शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की ग़ज़ल: चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए

चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हमसे सीख जाए,
जी ही जी में तिलमिलाना कोई हमसे सीख जाए

अब्र क्या आँसू बहाना कोई हम से सीख जाए,
बर्क़ क्या है तिलमिलाना कोई हमसे सीख जाए

ज़िक्र-ए-शम-ए-हुस्न लाना कोई हम से सीख जाए
उन को दर-पर्दा जलाना कोई हमसे सीख जाए

हम ने अव्वल ही कहा था तू करेगा हम को क़त्ल
तेवरों का ताड़ जाना कोई हम से सीख जाए

लुत्फ़ उठाना है अगर मंज़ूर उस के नाज़ का
पहले उस का नाज़ उठाना कोई हमसे सीख जाए

जो सिखाया अपनी क़िस्मत ने वगरना उस को ग़ैर
क्या सिखाएगा सिखाना कोई हमसे सीख जाए

देख कर क़ातिल को भर लाए ख़राश-ए-दिल में ख़ूँ
सच तो ये है मुस्कुराना कोई हमसे सीख जाए

तीर ओ पैकाँ दिल में जितने थे दिए हम ने निकाल
अपने हाथों घर लुटाना कोई हमसे सीख जाए

कह दो क़ासिद से कि जाए कुछ बहाने से वहाँ
गर नहीं आता बहाना कोई हमसे सीख जाए

ख़त में लिखवा कर उन्हें भेजा तो मतला दर्द का
दर्द-ए-दिल अपना जताना कोई हमसे सीख जाए

जब कहा मरता हूँ वो बोले मिरा सर काट कर
झूठ को सच कर दिखाना कोई हमसे सीख जाए

वाँ हिले अबरू यहाँ फेरी गले पर हम ने तेग़
बात का ईमा से पाना कोई हमसे सीख जाए

तेग़ तो ओछी पड़ी थी गिर पड़े हम आप से
दिल को क़ातिल के बढ़ाना कोई हमसे सीख जाए

ज़ख़्म को सीते हैं सब पर सोज़न-ए-अल्मास से
चाक सीने के सिलाना कोई हमसे सीख जाए

क्या हुआ ऐ ‘ज़ौक़’ हैं जूँ मर्दुमुक हम रू-सियाह
लेकिन आँखों में समाना कोई हमसे सीख जाए

[रदीफ़-कोई हमसे सीख जाए]
[क़ाफ़िए- खाना, तिलमिलाना, बहाना, तिलमिलाना, लाना, जलाना, जाना, उठाना, सिखाना, मुस्कुराना, लुटाना, बहाना, जताना,दिखाना, पाना, बढ़ाना, सिलाना, समाना]
[ज़ौक़ की ग़ज़ल के पहले तीन शे’र मत’ले हैं, मत’ला उस शे’र को कहते हैं जिसके दोनों मिसरों में रदीफ़ और क़ाफ़िए की पाबंदी होती है]
[ग़ालिब और मोमिन के दौर के शा’इर ज़ौक़ आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ‘ज़फ़र’ के उस्ताद थे, ‘ज़फ़र’ भी अपने दौर के बड़े शा’इर माने जाते हैं]

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