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Rukhsar ShayariSahitya Duniya

Rukhsar Shayari

मुद्दत से इक लड़की के रुख़्सार की धूप नहीं आई
इस लिए मेरे कमरे में इतनी ठंडक रहती है

बशीर बद्र
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दिल बुझने लगा आतिश-ए-रुख़्सार के होते
तन्हा नज़र आते हैं ग़म-ए-यार के होते

ज़ेहरा निगाह
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फ़िल्मों में आए शेर…

देखना हर सुब्ह तुझ रुख़्सार का
है मुताला मतला-ए-अनवार का

वली मोहम्मद वली
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जाने किस दम निकल आए तिरे रुख़्सार की धूप
मुद्दतों ध्यान तिरे साया-ए-दर पर रक्खा

अहमद मुश्ताक़
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सीरत न हो तो आरिज़-ओ-रुख़्सार सब ग़लत
ख़ुशबू उड़ी तो फूल फ़क़त रंग रह गया

ज़हीर काश्मीरी
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बदन गुल चेहरा गुल रुख़्सार गुल लब गुल दहन है गुल
सरापा अब तो वो रश्क-ए-चमन है ढेर फूलों का

नज़ीर अकबराबादी
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फ़हमी बदायूनी के बेहतरीन शेर..

चाहता है इस जहाँ में गर बहिश्त
जा तमाशा देख उस रुख़्सार का

वली मोहम्मद वली
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आँखों में न ज़ुल्फ़ों में न रुख़्सार में देखें
मुझको मिरी दानिश मिरे अफ़्कार में देखें

फ़ातिमा हसन
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क़ामत तिरी दलील क़यामत की हो गई
काम आफ़्ताब-ए-हश्र का रुख़्सार ने किया

हैदर अली आतिश
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सो देख कर तिरे रुख़्सार ओ लब यक़ीं आया
कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी

अहमद फ़राज़
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मुद्दत से इक लड़की के रुख़्सार की धूप नहीं आई
इस लिए मेरे कमरे में इतनी ठंडक रहती है

बशीर बद्र
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‘ग़म’ शब्द पर ख़ूबसूरत शेर

उनके रुख़्सार पे ढलके हुए आँसू तौबा
मैंने शबनम को भी शोलों पे मचलते देखा

साहिर लुधियानवी
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उसके रुख़्सार देख जीता हूँ
आरज़ी मेरी ज़िंदगानी है

नाजी शाकिर
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तिरे रुख़्सार से बे-तरह लिपटी जाए है ज़ालिम
जो कुछ कहिए तो बल खा उलझती है ज़ुल्फ़ बे-ढंगी

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
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हाजत नहीं बनाओ की ऐ नाज़नीं तुझे
ज़ेवर है सादगी तिरे रुख़्सार के लिए

हैदर अली आतिश
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आरिज़ों पर ये ढलकते हुए आँसू तौबा
हमने शोलों पे मचलती हुई शबनम देखी

जोश मलसियानी
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जो उनको लिपटा के गाल चूमा हया से आने लगा पसीना
हुई है बोसों की गर्म भट्टी खिंचे न क्यूँकर शराब-ए-आरिज़

अहमद हुसैन माइल
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यूनिवर्सिटी छात्रों को पसंद आने वाली शायरी

निखर गए हैं पसीने में भीग कर आरिज़
गुलों ने और भी शबनम से ताज़गी पाई

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
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आओ हुस्न-ए-यार की बातें करें
ज़ुल्फ़ की रुख़्सार की बातें करें

चराग़ हसन हसरत

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या गुफ़्तुगू हो उन लब-ओ-रुख़्सार-ओ-ज़ुल्फ़ की
या उन ख़मोश नज़रों के लुत्फ़-ए-सुख़न की बात

जयकृष्ण चौधरी हबीब

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देखा है जिसने यार के रुख़्सार की तरफ़
हरगिज़ न जावे सैर कूँ गुलज़ार की तरफ़

सिराज औरंगाबादी

Rukhsar Shayari

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