गुलज़ार की किताब “ड्योढ़ी” की समीक्षा

Dyodhi Review

Dyodhi Review

“किताबों से कभी गुज़रो तो यूँ किरदार मिलते हैं
गए वक़्त की ड्योढ़ी में खड़े कुछ यार मिलते हैं”

बस कुछ इसी तरह कई किरदारों से मुलाक़ात हुई गुलज़ार की लिखी “ड्योढ़ी” को पढ़ते हुए. यूँ तो गुलज़ार के शब्दों को कई बार सुना है पर उन्हें पहली बार पढ़ा.
ड्योढ़ी कई छोटी कहानियों का संग्रह है और हर पहली कहानी दूसरी से बिलकुल अलग लगती है। इस एक संग्रह में गुलज़ार आपको कभी सीमा पार ले जाते हैं तो कभी आसमान की सैर करवाते हैं, कभी बचपन की मासूमियत से रुबरु करवाते हैं तो कभी फुटपाथ पर पलती ज़िन्दगी की मुश्किलों का अहसास करवाते हैं,कभी पहाड़ों की सैर करवाते हैं तो कभी आसमान में पतंग के साथ गोते लगवाते हैं। ज़िन्दगी में जिस तरह कई रंगों का समावेश है उसी तरह ये संग्रह भी आपको कभी ख़ुश, कभी भावुक तो कभी ठहाके मारने पर मजबूर करता है।

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घनी कहानी, छोटी शाखा: आचार्य चतुरसेन की कहानी ‘न मालूम सी एक ख़ता’ का पहला भाग

Acharya Chatursen Ki Kahani

Acharya Chatursen Ki Kahani न मालूम सी एक ख़ता- आचार्य चतुरसेन भाग-1 Acharya Chatursen Ki Kahani:  गर्मी के दिन थे। बादशाह ने उसी फागुन में सलीमा से नई शादी की थी। सल्तनत के झंझटों से दूर रहकर नई दुल्हन के साथ प्रेम और आनंद की कलोल करने वे सलीमा को लेकर कश्मीर के दौलतख़ाने में … Read more

दो शाइर, दो नज़्में(13): मजीद अमजद और अख़्तर-उल-ईमान

Majid Amjad Hindi Shayari

Majid Amjad Hindi Shayari मजीद अमजद की नज़्म “मंटो” मैंने उस को देखा है उजली उजली सड़कों पर इक गर्द भरी हैरानी में फैलती भीड़ के औंधे औंधे कटोरों की तुग़्यानी में जब वो ख़ाली बोतल फेंक के कहता है ”दुनिया! तेरा हुस्न, यही बद-सूरती है” दुनिया उसको घूरती है शोर-ए-सलासिल बन कर गूँजने लगता है … Read more

घनी कहानी, छोटी शाखा: रवीन्द्र नाथ टैगोर की कहानी ‘पत्नी का पत्र’ का अंतिम भाग

15 साल तक एक साथ रहने की वजह से पत्नी ने कभी पति के नाम कोई चिट्ठी न लिखी, अब जबकि वो तीर्थ पर है तो उसने एक चिट्ठी लिखने की सोची. इस पत्र में वो बचपन में जो गुज़री वो बातें साझा करती है और बताती है कि किस तरह उसकी शादी हुई और वो माँ बनी तो लेकिन उसकी बेटी जन्म होते ही मर गयी और वो मझली बहु ही रह गयी. वो बताती है कि कैसे उसके घर के अन्दर औरतों का अनादर होता है और इसी वजह से शायद जब वो मौत के मुहाने पर थी तब भी उसे डर न लगा. इस बीच उसकी बड़ी जेठानी की बहन बिंदु अपने चचेरे भाइयों से बेहद परेशान होकर अपनी बहन के पास आ जाती है लेकिन जब बड़ी जेठानी के पति को ये बात पसंद नहीं आती तो उसे भी अपनी बहन बला की तरह लगने लगती है. बिंदु को घर में नौकरानियों जैसे काम दे दिए गए. उसकी घर में बुरी हालत देख लेखिका उसे अपने अपने साथ कर लेती है. अपने पत्र के आगे के हिस्से में वो अपने पति से शिकायत करती है कि किस तरह बिंदु के साथ घरवालों ने भेदभाव जारी रक्खा, इसके अतिरिक्त उसने पत्र में बताया कि किस तरह से बिंदु उससे स्नेह रखती थी और कैसे उसका मन लग जाता था. वो बताती है कि घर के लोग बिंदु के ऊपर किसी तरह का इलज़ाम लगाने से न चूकते थे. वो कहती है कि जिस तरह तुम लोगों का क्रोध बढ़ रहा था उसी तरह बिंदु की उम्र भी बढ़ रही थी और तुम लोग अस्वाभाविक ढंग से परेशान हो रहे थे. घर के लोगों ने बिंदु की मर्ज़ी की परवाह न करते हुए बिंदु की शादी करा दी, बिंदु को शादी के दूसरे दिन मालूम हुआ कि लड़का पागल है. ये भी ज़ाहिर हुआ कि सास भी आधी पागल है. किसी तरह बिंदु तीसरे रोज़ ही वहाँ से भाग आई. इसके बाद हंगामे का माहौल बन गया. हंगामे की शान्ति के लिए बिंदु अपने ससुराल वालों के साथ चली गयी. परन्तु पत्र लेखिका को बिंदु की चिंता सताने लगी और इसका हल निकालने के लिए उसने अपने भाई शरद को कलकत्ते से बुला लिया. शरद प्रदर्शनकारी था और इस लिहाज़ से वो इस तरह के काम कर सकता था. शरद के घर आ जाने से पत्र लेखिका के पति को अच्छा न लगा. बहरहाल, बिंदु इस बीच एक और बार भागी और अपने चचेरे भाईयों के पास गयी जिन्होंने उसे फ़ौरन ही ससुराल वालों के हवाले कर दिया. शरद को उसकी बहन ने ये ज़िम्मेदारी दी कि किसी तरह वो बिंदु को पुरी की ट्रेन में बैठाए. शरद इस काम को करता उसके पहले ही उसे मालूम हुआ कि बिंदु ने आत्महत्या कर ली. इस बात पर भी लोग बिंदु को ही कोसने लगे. अब आगे…

ऐसा ही था बिंदु का दुर्भाग्य। जितने दिन जीवित रही, तनिक भी यश नहीं मिल सका। न रूप का, न गुण का – मरते वक्त भी यह नहीं हुआ कि सोच-समझकर कुछ ऐसे नए ढंग से मरती कि दुनिया-भर के लोग खुशी से ताली बजा उठते। मरकर भी उसने लोगों को नाराज ही किया।
जीजी कमरे में जाकर चुपचाप रोने लगीं, लेकिन उस रोने में जैसे एक सांत्वना थी। कुछ भी सही, जान तो बची, मर गई, यही क्या कम है। अगर बची रहती तो न जाने क्या हो जाता।

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दो शाइर, दो ग़ज़लें (23): राजेन्द्र मनचंदा बानी और अहमद फ़राज़

अहमद फ़राज़ मनचंदा बानी

(अहमद फ़राज़ मनचंदा बानी) राजेन्द्र मनचंदा “बानी” की ग़ज़ल ऐ दोस्त मैं ख़ामोश किसी डर से नहीं था क़ाइल ही तिरी बात का अंदर से नहीं था हर आँख कहीं दौर के मंज़र पे लगी थी बेदार कोई अपने बराबर से नहीं था क्यूँ हाथ हैं ख़ाली कि हमारा कोई रिश्ता जंगल से नहीं था … Read more

राईशा लालवानी की किताब “The diary on the Fifth Floor” की समीक्षा

The diary on the Fifth Floor Review

The diary on the Fifth Floor Review ~ Raisha Lalwani इन दिनों हम कितनी बेवजह की उलझनों में उलझे रहते हैं..।इन मानसिक उलझनों का हल हमारे पास ही है बस वो कहीं नज़र नहीं आता और हम इन उलझनों को सुलझाने की बजाय और ज़्यादा उलझते जाते हैं। कुछ समझ नहीं आता और पता भी … Read more

घनी कहानी, छोटी शाखा: रवीन्द्र नाथ टैगोर की कहानी ‘पत्नी का पत्र’ का पाँचवा भाग

15 साल तक एक साथ रहने की वजह से पत्नी ने कभी पति के नाम कोई चिट्ठी न लिखी, अब जबकि वो तीर्थ पर है तो उसने एक चिट्ठी लिखने की सोची. इस पत्र में वो बचपन में जो गुज़री वो बातें साझा करती है और बताती है कि किस तरह उसकी शादी हुई और … Read more

घनी कहानी, छोटी शाखा: रवीन्द्र नाथ टैगोर की कहानी ‘पत्नी का पत्र’ का चौथा भाग

15 साल तक एक साथ रहने की वजह से पत्नी ने कभी पति के नाम कोई चिट्ठी न लिखी, अब जबकि वो तीर्थ पर है तो उसने एक चिट्ठी लिखने की सोची. इस पत्र में वो बचपन में जो गुज़री वो बातें साझा करती है और बताती है कि किस तरह उसकी शादी हुई और … Read more

घनी कहानी, छोटी शाखा: रवीन्द्र नाथ टैगोर की कहानी ‘पत्नी का पत्र’ का तीसरा भाग

15 साल तक एक साथ रहने की वजह से पत्नी ने कभी पति के नाम कोई चिट्ठी न लिखी, अब जबकि वो तीर्थ पर है तो उसने एक चिट्ठी लिखने की सोची. इस पत्र में वो बचपन में जो गुज़री वो बातें साझा करती है और बताती है कि किस तरह उसकी शादी हुई और … Read more

घनी कहानी, छोटी शाखा: रवीन्द्र नाथ टैगोर की कहानी ‘पत्नी का पत्र’ का दूसरा भाग

15 साल तक एक साथ रहने की वजह से पत्नी ने कभी पति के नाम कोई चिट्ठी न लिखी, अब जबकि वो तीर्थ पर है तो उसने एक चिट्ठी लिखने की सोची. इस पत्र में वो बचपन में जो गुज़री वो बातें साझा करती है और बताती है कि किस तरह उसकी शादी हुई और … Read more