दो शाइर, दो नज़्में(9): फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और अख़्तर-उल-ईमान

wo humsafar tha वो हम-सफ़र था मगर उससे हम-नवाई न थी Urdu ke Mushkil Lafz Akhtar Ul Iman Shayari Majaz Shayari Famous Barish Shayari Barsaat Shayari Baarish Shayari Hindi Kahani Arghwan Rabbhi Urdu Lafz Aghori Ka Moh Acaharya Ram Chandra Shukl Ki Kahani Gyaarah Varsh Ka Samay Jigar aur dil ko bachana

Akhtar Ul Iman Shayari Faiz Ahmed Faiz Shayari फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म: बोल बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़बाँ अब तक तेरी है तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा बोल कि जाँ अब तक तेरी है देख कि आहन-गर की दुकाँ में तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने … Read more

दो शाइर, दो नज़्में(7): परवीन शाकिर और फ़हमीदा रियाज़

Meer Ki Shayari Parveen Shakir Fehmida Riyaz हिन्दी व्याकरण उ और ऊ ज़ वाले शब्द Khaleel Jibran Kahani In Hindi Bhikharin Kahani Madhavrao Sapre Ki Ek Tokri Bhar Mitti Bang Mahila Rajendra Bala Ghosh Ki Kahani Dulaiwali

Parveen Shakir Fehmida Riyaz _________________________________ परवीन शाकिर की नज़्म: नहीं मेरा आँचल मैला है नहीं मेरा आँचल मैला है और तेरी दस्तार के सारे पेच अभी तक तीखे हैं किसी हवा ने इनको अब तक छूने की जुरअत नहीं की है तेरी उजली पेशानी पर गए दिनों की कोई घड़ी पछतावा बन के नहीं फूटी … Read more

दो शाइर, दो नज़्में(6): जाँ निसार अख़्तर और जिगर श्योपुरी

Javed ya Zaved असग़र गोंडवी अल्लामा इक़बाल Mohabbat Shayari Nazm Mohabbat Shayari Nazm हिन्दी व्याकरण ए और ऐ Urdu Shayari Meter Zehra Nigah Shayari Best Urdu Shayari Abdul Hamid Adam Shayari wazeer aagha ghazal aise Usne Kaha Tha Hindi Ki Pahli Kahani Satyajeet Ray Ki Kahani Sahpathi Urdu Shayari Tree

Mohabbat Shayari Nazm जाँ निसार अख़्तर की नज़्म: तजज़िया मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन, फिर भी जब पास तू नहीं होती ख़ुद को कितना उदास पाता हूँ गुम से अपने हवास पाता हूँ जाने क्या धुन समाई रहती है इक ख़मोशी सी छाई रहती है दिल से भी गुफ़्तुगू नहीं होती मैं तुझे चाहता नहीं … Read more

उर्दू शायरी और शब्द: अलविदा’अ, शाइरी, त’अज्जुब…

Urdu Shayari Mein Shabdon ka Prayog Jaleel aur Zaleel Urdu ke words Urdu Bhasha Ka Itihas Urdu Shayari Ke Shabd

Urdu Shayari Ke Shabd अलविदा’अ(الوداع): इसका अर्थ होता है इस शब्द को अक्सर लोग अलविदा पढ़ते हैं लेकिन इसको सही तरह से पढेंगे तो अलविदा’अ पढेंगे. उर्दू शा’इरी में इसका वज़्न 2121 लिया जाता है. (अल-2, वि-1,दा-2,अ-1) मख़मूर सईदी का शेर- घर में रहा था कौन कि रुख़्सत करे हमें, चौखट को अलविदा’अ कहा और … Read more

उर्दू शायरी और शब्द : हमला-आवर, आशुफ़्ता, गुज़िश्ता, दस्त और दश्त…

Urdu Shayari se jude lafz Urdu ke words Khulasa Habib Jalib Shayari Hindi Parveen Shakir Sardar Jafri Nazm Kya Hoti Hai

Urdu Shayari se jude lafz हमला-आवर (حملہ آور): हमला-आवर एक ऐसा लफ़्ज़ है जिसे आम लोग ‘हमलावर’ पढ़ते हैं जोकि सही नहीं है. इसका सही उच्चारण हम’ल’आवर ही है. उर्दू शा’इरी में इसका वज़्न 21-22 लिया जाता है,(हम-2, ल-1, आ-2, वर-2). साक़ी फ़ारूक़ी का मत’ला देखिये- हमला-आवर कोई अक़ब से है, ये तआक़ुब में कौन … Read more

दो शा’इर, दो ग़ज़लें (13): परवीन शाकिर और हसरत मोहानी..

Breakup shayari Ab Aur Kya Kisi Se Marasim Badhayen Hum Koo Ba Koo Phail Gayi Baat Shanasayi Ki Rehman Faris Shayari Zulf Shayari

परवीन शाकिर की ग़ज़ल: Koo Ba Koo Phail Gayi Baat Shanasayi Ki कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की, उसने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उसने बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया बस यही बात … Read more

दो शा’इर, दो नज़्में (3): फ़रहत एहसास और फ़हमीदा रियाज़

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Farhat Ehsas Nazm फ़रहत एहसास की नज़्म: ख़ुद-आगही वो कैसी तारीक घड़ी थी, जब मुझको एहसास हुआ था मैं तन्हा हूँ उस दिन भी सीधा-सादा सूरज निकला था शहर में कोई शोर नहीं था घर में कोई और नहीं था अम्माँ आटा गूँध रही थीं अब्बा चारपाई पर बैठे ऊँघ रहे थे धीरे-धीरे धूप चढ़ी थी … Read more

14 साल की उम्र से शुरू’अ हुआ ज़हरा निगाह की शा’इरी का सफ़र…

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Zehra Nigah Shayari

“हिकायत ए ग़म ए दुनिया तवील थी कह दी,
हिकायत ए ग़म ए दिल मुख़्तसर है क्या कहिये”

ज़हरा निगाह का ये शे’र अपने आप में बहुत कुछ कह देता है. कहते हैं कि शा’इरा/शा’इर जो बातें शा’इरी के ज़रिये कहती/कहता है वो असल में कहीं ना कहीं ज़िन्दगी की उधेड़बुन का हिस्सा होता है. कुछ ऐसी बातें जो हम कह नहीं पाते वो हम लिखते हैं और कुछ इस तरह से कि बात अपनी होके भी अपनी ना लगे. ज़हरा निगाह की शा’इरी कुछ इसी तरह से है, इंसान के मासूम जज़्बात को जितनी मासूमियत से ज़हरा अपनी शा’इरी में शामिल करती हैं वो इस दौर के कम ही शा’इर कर पाते हैं.

ज़हरा निगाह का जन्म 14 मई 1937 को हैदराबाद में हुआ था. ज़हरा के पिता सिविल सर्वेंट थे और उन्हें शा’इरी का ख़ूब शौक़ था. 1922 के दौर में उनके घर में इक़बाल, मख़्दूम, फै़ज़ और मजाज़ जैसे शा’इरों की बैठकें लगती थीं, अदब पर ख़ूब चर्चा हुआ करती थी. वो कहती हैं कि academics, शा’इरी और संगीत ने मेरे घर को पूरा किया था. ज़हरा ने एक इंटरव्यू में बताया कि उनकी माँ संगीत सीखा करती थीं और उनके उस्ताद उन्हें पर्दे के पीछे से संगीत सिखाते थे. फ्रंटलाइन मैगज़ीन के मुताबिक़ वो कहती हैं कि उनके नाना बच्चों से कहते थे कि हाली और इक़बाल के अश’आर का सही अर्थ, उच्चारण और बोलने का तरीक़ा याद करो. उन्होंने बताया कि उनके नाना कहते थे,”अगर तुम इक़बाल की ‘जवाब ए शिकवा’ या ‘मुसद्दस ए हाली’ याद कर लोगे तो तुम्हें 5 रूपये मिलेंगे’ और हम सारी ताक़त से उन्हें याद करने लगते थे. ज़हरा ने बताया कि जब वो चार साल की थीं तभी उनका तलफ़्फु़ज़ ठीक हो गया था और 14 की उम्र तक तो उन्होंने कई शा’इरों की उत्कृष्ट रचनाओं को याद कर लिया था.

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एक ज़मीन, दो ग़ज़लें (1): मख़दूम और फ़ैज़..

Subah Shayari Ghazal Zameen Shayari

साहित्य दुनिया की आज हम एक और सीरीज़ शुरू’अ कर रहे हैं, “एक ज़मीन दो ग़ज़लें”. Ghazal Zameen Shayari इस सीरीज़ में हम एक ही ज़मीन में कही गयीं दो ग़ज़लें आपके सामने पेश करेंगे (हालाँकि एक ज़मीन में कई ग़ज़लें हो सकती हैं). इस सीरीज़ की पहली क़िश्त में हम “मख़दूम मुहीउद्दीन और फ़ैज़ … Read more

दो शा’इर, दो नज़्में (2): मख़दूम और फै़ज़…

Makhdoom Aur Faiz Ki Nazm Urdu Shayari Lafz Lucknow

Makhdoom Aur Faiz Ki Nazm मख़दूम मुहिउद्दीन की नज़्म: “चारागर” इक चमेली के मंडवे-तले मय-कदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर दो बदन प्यार की आग में जल गए प्यार हर्फ़-ए-वफ़ा प्यार उन का ख़ुदा प्यार उन की चिता दो बदन ओस में भीगते चाँदनी में नहाते हुए जैसे दो ताज़ा-रौ ताज़ा-दम फूल पिछले-पहर ठंडी … Read more