Gen Z शायरी: नौजवानों को पसंद आने वाले बेहतरीन शेर

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Gen Z शायरी में आज की युवा पीढ़ी के प्यार, दोस्ती, अकेलेपन, रिश्तों, सोशल मीडिया और बदलती ज़िंदगी के एहसास दिखाई देते हैं। नई पीढ़ी को पसंद आने वाली शायरी सिर्फ़ मोहब्बत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रोज़मर्रा की ज़िंदगी, जुदाई, उम्मीद और रिश्तों की बदलती तस्वीर भी दिखाई देती है।

इस पेज पर ऐसे चुनिंदा शेर पेश किए गए हैं जो अपनी सादगी, आधुनिक एहसास और असरदार अंदाज़ के कारण आज के नौजवानों के बीच लोकप्रिय हैं। इसमें फ़हमी बदायूनी, तहज़ीब हाफ़ी, जौन एलिया, जावेद अख़्तर, अहमद फ़राज़ और दूसरे मशहूर शायरों के अशआर शामिल हैं।

Gen Z को पसंद आने वाली शायरी और बेहतरीन शेर

ख़ुशी से काँप रही थीं ये उँगलियाँ इतनी
डिलीट हो गया इक शख़्स सेव करने में

फ़हमी बदायूनी
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मैंने उस की तरफ़ से ख़त लिक्खा
और अपने पते पे भेज दिया

फ़हमी बदायूनी
अहमद सलमान की शायरी
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अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

अहमद फ़राज़

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मैं तुझसे मिलने समय से पहले पहुँच गया था
सो तेरे घर के क़रीब आ कर भटक रहा हूँ

पल्लव मिश्रा
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मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता
अब इससे ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता

मुनव्वर राना
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मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा

अमीर क़ज़लबाश

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किसी रईस की महफ़िल का ज़िक्र ही क्या है
ख़ुदा के घर भी न जाएँगे बिन बुलाए हुए

अमीर मीनाई
तहज़ीब हाफ़ी: आज के दौर की शायरी का चमकता सितारा
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बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था
हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा

शौक़ बहराइची
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तेरा चुप रहना मिरे ज़ेहन में क्या बैठ गया
इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया

तहज़ीब हाफ़ी

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कौन इस घर की देख-भाल करे
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है

जौन एलिया

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दिल की बेताबी नहीं ठहरने देती है मुझे
दिन कहीं रात कहीं सुब्ह कहीं शाम कहीं

नज़ीर अकबराबादी
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कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई
कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए

रहमान फ़ारिस
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अब उनको याद कर के रो रहे हैं
बिछड़ते वक़्त रोना चाहिए था

फ़हमी बदायूनी

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा
कितना आसान था इलाज मिरा

फ़हमी बदायूनी

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टहलते फिर रहे हैं सारे घर में
तिरी ख़ाली जगह को भर रहे हैं

फ़हमी बदायूनी

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तुम्हारी शक्ल किसी शक्ल से मिलाते हुए
मैं खो गया हूँ नया रास्ता बनाते हुए

आशू मिश्रा

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याद उसे भी एक अधूरा अफ़्साना तो होगा
कल रस्ते में उसने हमको पहचाना तो होगा

जावेद अख़्तर

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तब हम दोनों वक़्त चुरा कर लाते थे
अब मिलते हैं जब भी फ़ुर्सत होती है

जावेद अख़्तर

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तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो

जावेद अख़्तर

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अब हवाएँ ही करेंगी रौशनी का फ़ैसला
जिस दिए में जान होगी वो दिया रह जाएगा

महशर बदायूँनी

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हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

मिर्ज़ा ग़ालिब

GenZ Shayari

ज़िया मज़कूर की शायरी

तुमको अच्छे लगे तो तुम रख लो
फूल तोड़े थे बेचने के लिए

ज़िया मज़कूर

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