दो शा’इर, दो नज़्में (2): मख़दूम और फै़ज़…

Makhdoom Aur Faiz Ki Nazm Urdu Shayari Lafz Lucknow

Makhdoom Aur Faiz Ki Nazm मख़दूम मुहिउद्दीन की नज़्म: “चारागर” इक चमेली के मंडवे-तले मय-कदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर दो बदन प्यार की आग में जल गए प्यार हर्फ़-ए-वफ़ा प्यार उन का ख़ुदा प्यार उन की चिता दो बदन ओस में भीगते चाँदनी में नहाते हुए जैसे दो ताज़ा-रौ ताज़ा-दम फूल पिछले-पहर ठंडी … Read more

दो शा’इर, दो नज़्में (1): परवीन शाकिर और सरदार जाफ़री…

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Parveen Shakir Sardar Jafri: साहित्य दुनिया में हम आज ‘दो शा’इर, दो नज़्में’ सीरीज़ शुरू’अ कर रहे हैं.आज हम परवीन शाकिर की नज़्म “ख्व़ाब” और अली सरदार जाफ़री की नज़्म “एक बात” आपके सामने पेश कर रहे हैं. परवीन शाकिर की नज़्म: ख्व़ाब खुले पानियों में घिरी लड़कियाँ, नर्म लहरों के छीॅंटे उड़ाती हुई, बात … Read more

मई दिवस: सलाम मछलीशहरी की नज़्म….”सड़क बन रही है”

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मई दिवस पर साहित्य दुनिया की ओर से पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं सलाम मछली शहरी की मशहूर नज़्म “सड़क बन रही है”. Salam Machhlishahri Ki Nazm मई के महीने का मानूस मंज़र ग़रीबों के साथी ये कंकर ये पत्थर वहाँ शहर से एक ही मील हट कर सड़क बन रही है ज़मीं … Read more

ग़ालिब के ख़तों के बारे में और उनका मुंशी हरगोपाल ‘तफ़्ता’ को लिखा ख़त

Ghalib ka khat .. मिर्ज़ा ग़ालिब परवीन शाकिर Urdu Shayari Shabd Ghalib Shayari Parveen Shakir Shayari Top Urdu Shayari Ghalib Ke Khat Ghalib Ke Baare Mein

Ghalib Ke Khat : मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) की शा’इरी के तो सभी दीवाने हैं लेकिन बात नस्र की करें तो उसमें भी ग़ालिब अव्वल ही आते हैं. उनके बारे में फ़िराक़ गोरखपुरी अपनी किताब ‘उर्दू भाषा और साहित्य’ में लिखते हैं,”ग़ालिब से पहले फ़ारसी के ढंग पर उर्दू के मुंशी लोग बनावटी और भारी … Read more

दो शा’इर, दो ग़ज़लें सीरीज़ (11): फै़ज़ अहमद फै़ज़ और असग़र गोंडवी…

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फै़ज़ अहमद फै़ज़ की ग़ज़ल-हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए Har Haqeeqat Majaz Ho Jaye हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए काफ़िरों की नमाज़ हो जाए मिन्नत-ए-चारा-साज़ कौन करे, दर्द जब जाँ-नवाज़ हो जाए इश्क़ दिल में रहे तो रुस्वा हो लब पे आए तो राज़ हो जाए लुत्फ़ का इंतिज़ार करता हूँ जौर ता हद्द-ए-नाज़ हो … Read more

दो शा’इर, दो ग़ज़लें(10): जाँ निसार अख़्तर और ज़ौक़…

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जाँ निसार अख़्तर की ग़ज़ल: अशआ’र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं (Ashaar mere yoon to zamane ke liye hain)

अशआ’र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं,
कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं

आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं

देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
[रदीफ़- के लिए हैं]
[क़ाफ़िए- ज़माने, सुनाने, लगाने, बुझाने, सजाने, जलाने, भुलाने]
Ashaar mere yoon to zamane ke liye hain
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इक़बाल की पुण्यतिथि पर उनको याद करते हुए उनके दस शे’र…

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Iqbal ke Top Sher: महान उर्दू और फ़ारसी शा’इर मुहम्मद इक़बाल की आज पुण्यतिथि है. उनका जन्म 9 नवम्बर 1877 में हुआ था. वो एक महान दार्शनिक, नेता और महान शा’इर थे. इक़बाल को आधुनिक काल की फ़ारसी शा’इरी का महानतम कवि कहा जाता है.  उर्दू में उनकी शिकवा और जवाब ए शिकवा बहुत मक़बूल … Read more

दो शा’इर, दो ग़ज़लें (9): मुनीर नियाज़ी और अमीर मीनाई….

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मुनीर नियाज़ी की ग़ज़ल: ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या (Zinda Rahen To Kya Mar Jayen Hum To Kya) ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या, दुनिया से ख़ामुशी से गुज़र जाएँ हम तो क्या हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने, इक ख़्वाब हैं … Read more

दो शा’इर, दो ग़ज़लें(8): अहमद फ़राज़ और बहज़ाद लखनवी…

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Ab Aur Kya Kisi Se Marasim Badhayen Hum अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल: अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम, ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम सहरा-ए-ज़िंदगी में कोई दूसरा न था, सुनते रहे हैं आप ही अपनी सदाएँ हम इस ज़िंदगी में … Read more

दो शा’इर, दो ग़ज़लें(7): जाँ निसार अख़्तर और महशर बदायूँनी…

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Aahat Si Koi Aaye To Lagta Hai Ke Tum Ho जाँ निसार अख़्तर की ग़ज़ल: आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो, आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो, साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में, शरमाए लचक जाए … Read more